कुरुक्षेत्र 12 अगस्त श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान ने कहा कि पुस्तकालय केवल किताबें रखने का स्थान नहीं, बल्कि ज्ञान, चिंतन और शोध का केंद्र है। विद्यार्थियों को अपने मूल ग्रंथों और शास्त्रीय साहित्य से अवश्य जुडऩा चाहिए तथा नियमित रूप से उनका अध्ययन करना चाहिए। विशेषकर आयुर्वेद के विद्यार्थियों के लिए मूल संहिताओं का अध्ययन बेहद महत्वपूर्ण है। पुस्तकों के अध्ययन से विषय की गहराई को समझने के साथ-साथ तर्क, चिंतन और शोध की क्षमता भी विकसित होती है। वे बुधवार को राष्ट्रीय राष्ट्रीय पुस्तकालय अध्यक्ष दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे।
कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान ने कहा कि आज डिजिटल युग में जानकारी प्राप्त करना पहले की अपेक्षा बहुत आसान हो गया है, लेकिन पुस्तक और मूल ग्रंथों के अध्ययन का महत्व कम नहीं हुआ है। विद्यार्थी जितना अधिक पढ़ेंगे, उतना ही उनका ज्ञान व्यापक और दृष्टिकोण समृद्ध होगा। उन्होंने विद्यार्थियों से पुस्तकालय का अधिक से अधिक उपयोग करने तथा अध्ययन की नियमित आदत विकसित करने का आह्वान किया। डॉ. रंगनाथन की सोच आज के विद्यार्थियों के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे पुस्तकालय को अपनी नियमित अध्ययन दिनचर्या का हिस्सा बनाएं और पुस्तकों के माध्यम से ज्ञान की परंपरा से निरंतर जुड़े रहें। डॉ. शियाली रामामृत रंगनाथन का जन्म 12 अगस्त 1892 को तमिलनाडु के शियाली में हुआ था। उन्हें भारत में पुस्तकालय विज्ञान का जनक माना जाता है। उन्होंने पुस्तकालयों को केवल पुस्तकों के संग्रह तक सीमित रखने के बजाय उन्हें विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और समाज के लिए ज्ञान के सक्रिय केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया।
उन्होंने कहा कि डॉ. रंगनाथन के सबसे महत्वपूर्ण योगदानों में वर्ष 1931 में प्रकाशित उनकी प्रसिद्ध पुस्तक द फाइव लॉज़ ऑफ लाइब्रेरी साइंस शामिल है। इसमें उन्होंने पुस्तकालय विज्ञान के पांच मूल सिद्धांत दिए-पुस्तकें उपयोग के लिए हैं, प्रत्येक पाठक को उसकी पुस्तक, प्रत्येक पुस्तक का उसका पाठक, पाठक का समय बचाइए तथा पुस्तकालय एक वर्धनशील संस्था है। इन सिद्धांतों ने आधुनिक पुस्तकालय व्यवस्था को नई दिशा दी और आज भी पुस्तकालय सेवाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। उन्होंने कोलन क्लासिफिकेशन जैसी महत्वपूर्ण वर्गीकरण प्रणाली विकसित की, जिसने पुस्तकों एवं ज्ञान-सामग्री को व्यवस्थित करने के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे वर्ष 1924 में मद्रास विश्वविद्यालय के पुस्तकालय अध्यक्ष बने और बाद में पुस्तकालय विज्ञान के शिक्षण एवं प्रशिक्षण को विकसित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कुलसचिव डॉ. कृष्णकांत गुप्ता ने कहा कि विश्वविद्यालय में पुस्तकालय सुविधाओं को और सुदृढ़ करने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं,ताकि विद्यार्थियों और शोधार्थियों को बेहतर अध्ययन वातावरण मिल सके। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे पुस्तकालय संसाधनों का अधिकतम उपयोग करते हुए अपने ज्ञान को समृद्ध करें। पुस्तकालयाध्यक्ष विनोद कुमार ने डॉ. एसआर रंगनाथन के जीवन और उनके योगदान पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। डॉ. रंगनाथन के योगदान को देखते हुए भारत में उनकी जयंती 12 अगस्त को राष्ट्रीय पुस्तकालय अध्यक्ष दिवस के रूप में मनाई जाती है। उन्हें 1957 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। उनका पूरा जीवन इस विचार को समर्पित रहा कि ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे और समाज के विकास में उपयोगी बने। इस अवसर पर डीन अकादमिक अफेयर्स प्रो. रणधीर सिंह, आरएंडआई निदेशक प्रो. दीप्ति पाराशर, डॉ. सुरेंद्र सिंह सेहरावत, डॉ. सुनील गोदारा, पवन नांदल, ममता रानी व पूनम सहित विद्यार्थी उपस्थित रहे।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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