करनाल, 12 अगस्त। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र को अधिक सक्षम, सशक्त एवं व्यवसाय-अनुकूल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 को संसद द्वारा पारित कर दिया गया है। यह संशोधन एमएसएमई क्षेत्र के विकास को गति देने, कारोबार में सुगमता बढ़ाने, विलंबित भुगतान से संबंधित समस्याओं का समाधान करने तथा विश्वास-आधारित नियामक वातावरण तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
एमएसएमई-डीएफओ करनाल के उप निदेशक के. सी. मीणा ने जानकारी देते हुए बताया कि एमएसएमई विकास अधिनियम वर्ष 2006 में अधिसूचित किया गया था और इसके लागू होने के 20 वर्ष पूरे हो चुके हैं। तकनीकी प्रगति, आईटी आधारित प्रणालियों के विस्तार तथा बदलते कारोबारी एवं कानूनी परिदृश्य को देखते हुए अधिनियम में संशोधन आवश्यक था। वर्तमान में उद्यम पोर्टल पर पंजीकृत एमएसएमई की संख्या 1 अप्रैल 2023 के 1.65 करोड़ से बढक़र 9.16 करोड़ हो गई है। एमएसएमई क्षेत्र 40 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है और भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
उन्होंने बताया कि संशोधन के तहत उद्यम पंजीकरण पोर्टल को एमएसएमई के लिए डिजिटल, नि:शुल्क एवं स्वैच्छिक पंजीकरण मंच के रूप में स्थायी दर्जा प्रदान किया गया है। एमएसएमई के लिए पंजीकरण स्वैच्छिक रहेगा। इससे उद्यमों के औपचारिकरण को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ सरकारी योजनाओं एवं सुविधाओं तक उनकी पहुंच आसान होगी। संशोधन में सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के विवादों के समयबद्ध एवं कम लागत में समाधान के लिए ऑनलाइन विवाद समाधान की व्यवस्था की गई है। यदि किसी डिक्री, मध्यस्थता निर्णय या आदेश को रद्द करने संबंधी आवेदन छह महीने से अधिक समय तक लंबित रहता है, तो न्यायालयों के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वे सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के आपूर्तिकर्ताओं को दिए गए निर्णय की राशि का कम से कम 50 प्रतिशत भुगतान करने का आदेश दें।
उन्होंने बताया कि विलंबित भुगतान से संबंधित मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए भी समय-सीमा निर्धारित की गई है। संशोधित प्रावधानों के अनुसार एमएसईएफसी अथवा संबंधित मध्यस्थता सेवा प्रदाता को पहली उपस्थिति के लिए निर्धारित तिथि से 90 दिनों के भीतर मध्यस्थता प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसके बाद एमएसईएफसी को मध्यस्थता समाप्त होने की तिथि से 30 दिनों के भीतर मामले को मध्यस्थता के लिए भेजना होगा। संबंधित संस्था या केंद्र को दलीलें/पक्ष प्रस्तुत किए जाने की प्रक्रिया पूरी होने की तिथि से 90 दिनों के भीतर निर्णय देना होगा। संशोधित अधिनियम की धारा 18 के तहत सुविधा परिषद अथवा मध्यस्थता सेवा प्रदाता या किसी वैकल्पिक विवाद समाधान संस्था द्वारा किया गया मध्यस्थता समझौता अथवा निर्णय संबंधित क्षेत्र के जिला कलेक्टर, उपायुक्त या अधिसूचित प्राधिकारी के माध्यम से भूमि राजस्व के बकाये के रूप में वसूल किया जा सकेगा। इससे एमएसएमई को उनकी बकाया राशि की वसूली में प्रभावी सहायता मिलेगी।
उन्होंने बताया कि सभी केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (सीपीएसई) के लिए एमएसएमई से वस्तुओं एवं सेवाओं की खरीद के चालानों का निपटारा ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम (टीआरईडीएस) प्लेटफॉर्म के माध्यम से किए जाने की व्यवस्था की गई है। राज्यों को भी अपने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को टीआरईडीएस के माध्यम से चालान निपटान की सुविधा अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु सक्षम बनाया गया है। टीआरईडीएस एमएसएमई को अतिरिक्त नकदी प्रवाह उपलब्ध कराने और समय पर भुगतान सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण संस्थागत मंच के रूप में उभरा है। टीआरईडीएस पर चालान डिस्काउंटिंग वर्ष 2022-23 में 40 हजार करोड़ रुपये से बढक़र वर्ष 2025-26 में 3.47 लाख करोड़ रुपये हो गई है। सीपीएसई द्वारा चालानों का निपटारा अनिवार्य रूप से टीआरईडीएस के माध्यम से किए जाने से एमएसएमई के भुगतान संबंधी मुद्दों में और कमी आने की उम्मीद है।
उन्होंने बताया कि संशोधन के तहत सूक्ष्म एवं लघु उद्यम सुविधा परिषद (एमएसईएफसी) की संरचना को भी तर्कसंगत बनाया गया है। अब राज्य सरकारें एमएसई को देय भुगतान से संबंधित विवादों के तेजी से निपटारे के लिए एक से अधिक एमएसईएफसी स्थापित कर सकेंगी। साथ ही, राज्य सरकारों को एमएसईएफसी के लिए नियम बनाने का अधिकार भी दिया गया है। संशोधन में कारोबार को सरल बनाने के उद्देश्य से कई प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का प्रावधान किया गया है। पहले एमएसएमईडी अधिनियम के तहत पंजीकरण नहीं कराने या जानकारी उपलब्ध नहीं कराने पर दोषसिद्धि एवं जुर्माने का प्रावधान था। अब इन मामलों में क्रमिक नागरिक दंड की व्यवस्था की गई है। गलत जानकारी देने के मामलों में पहली बार चेतावनी तथा दूसरी एवं उसके बाद की घटनाओं में दंड का प्रावधान किया गया है। इसी प्रकार खरीदारों द्वारा वार्षिक खातों में ब्याज सहित बकाया भुगतान की जानकारी का खुलासा नहीं करने पर भी दोषसिद्धि एवं जुर्माने के स्थान पर पहली बार चेतावनी, दूसरी बार दंड तथा तीसरी और उसके बाद की घटनाओं में जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इन प्रावधानों से कारोबार करने में आसानी, विश्वास-आधारित नियामक वातावरण तथा नियमों के बेहतर अनुपालन को बढ़ावा मिलेगा।
उन्होंने बताया कि एमएसएममई विकास एवं संशोधन विधेयक, 2026 सरकार की ‘विकसित भारत-2047’ की परिकल्पना के अनुरूप एमएसएमई क्षेत्र को सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। एक मजबूत एवं जीवंत एमएसएमई क्षेत्र समावेशी, टिकाऊ एवं रोजगार-प्रधान आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संशोधनों से उद्यमों के औपचारिकरण को बढ़ावा मिलेगा, एमएसएमई के विस्तार एवं बड़े स्तर पर विकास के लिए नए अवसर उपलब्ध होंगे तथा उन्हें विकास के चैंपियन के रूप में आगे बढ़ने में सहायता मिलेगी। साथ ही, इन संशोधनों से कारोबार में सुगमता बढ़ने के साथ-साथ नियमों के अनुपालन को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
