कुरुक्षेत्र, 30 जुलाई। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में हिंदी विभाग द्वारा प्रेमचंद जयंती के अवसर पर गणपति चन्द्र गुप्त हॉल में वर्तमान युग में प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद के साहित्यिक अवदान तथा महान क्रांतिकारी शहीद उधम सिंह के बलिदान को स्मरण करते हुए वक्ताओं ने उनके विचारों की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
संगोष्ठी में मुख्य वक्ता डॉ. अंबेडकर स्टडी सेंटर के निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद ने अपनी लेखनी के माध्यम से औपनिवेशिक मानसिकता और शोषणकारी व्यवस्था के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन न बनाकर समाज परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बनाया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य कालजयी और काल-संगत है, क्योंकि उसमें समाज के वास्तविक जीवन का चित्रण मिलता है। डॉ. प्रीतम सिंह ने कहा कि प्रेमचंद ने सामंतवादी सोच और सामाजिक विषमताओं का खुलकर विरोध किया तथा भारतीय समाज के सामान्य, उपेक्षित और वंचित वर्ग को अपनी कहानियों और उपन्यासों का नायक बनाया। उन्होंने पहली बार गांव की बोली, लोकजीवन और किसानों की पीड़ा को साहित्य के केंद्र में स्थापित कर हिंदी साहित्य को नई दिशा प्रदान की।
कला एवं भाषा संकाय की अधिष्ठाता प्रो. सुनीता सिरोहा ने अपने वक्तव्य में कहा कि प्रेमचंद ने समाज के यथार्थ स्वरूप को साहित्य में स्थान दिया। उनके साहित्य में समाज की विसंगतियां, आर्थिक असमानता, स्त्री की स्थिति, किसानों का संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत सजीव चित्रण मिलता है। यही कारण है कि प्रेमचंद आज भी हर पीढ़ी के लिए प्रासंगिक हैं और उनका साहित्य समाज को आत्ममंथन की प्रेरणा देता है।
हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. महासिंह पूनिया ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद गांव की आत्मा की आवाज थे। उन्होंने भारतीय ग्रामीण समाज की पीड़ा, संघर्ष, संस्कृति और संवेदनाओं को जिस गहराई से अभिव्यक्त किया, वह हिंदी साहित्य में अद्वितीय है। प्रेमचंद ने किसानों, मजदूरों और आम जनमानस के जीवन को साहित्य का केंद्र बनाकर समाज के उस वर्ग को पहचान दिलाई, जिसकी आवाज लंबे समय तक अनसुनी रही। उनका साहित्य सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय मूल्यों का सशक्त संदेश देता है।
विशिष्ट अतिथि एवं राजकीय पीजी कॉलेज, अंबाला के इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अतुल यादव ने शहीद उधम सिंह के जीवन और बलिदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शहीद उधम सिंह देश के युवाओं के लिए राष्ट्रभक्ति, साहस और संकल्प के अमर प्रतीक हैं। उन्होंने बताया कि उधम सिंह ने अपने जीवन के विभिन्न चरणों में अनेक देशों की यात्राएं कीं और विदेशों में रहते हुए भी भारत की स्वतंत्रता के लिए निरंतर कार्य किया। जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला और उन्होंने उस अमानवीय अत्याचार का प्रतिशोध लेने का संकल्प लिया। वर्षों तक धैर्य और साहस के साथ अपने संकल्प को निभाते हुए उन्होंने जनरल माइकल ओश्ड्वायर को गोली मारकर जलियांवाला बाग के शहीदों के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि उधम सिंह का जीवन युवाओं को देशहित को सर्वाेपरि रखने और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देता है।
संगोष्ठी के दौरान प्रश्नोत्तर सत्र में विद्यार्थियों ने विभिन्न विषयों पर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। इस अवसर पर प्रो. धर्मवीर सिरोही डॉ. जसबीर, डॉ. गुरदीप, डॉ. रामचंद्र, सहित अनेक शिक्षक उपस्थित रहे।
संगोष्ठी में मुख्य वक्ता डॉ. अंबेडकर स्टडी सेंटर के निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद ने अपनी लेखनी के माध्यम से औपनिवेशिक मानसिकता और शोषणकारी व्यवस्था के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन न बनाकर समाज परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बनाया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य कालजयी और काल-संगत है, क्योंकि उसमें समाज के वास्तविक जीवन का चित्रण मिलता है। डॉ. प्रीतम सिंह ने कहा कि प्रेमचंद ने सामंतवादी सोच और सामाजिक विषमताओं का खुलकर विरोध किया तथा भारतीय समाज के सामान्य, उपेक्षित और वंचित वर्ग को अपनी कहानियों और उपन्यासों का नायक बनाया। उन्होंने पहली बार गांव की बोली, लोकजीवन और किसानों की पीड़ा को साहित्य के केंद्र में स्थापित कर हिंदी साहित्य को नई दिशा प्रदान की।
कला एवं भाषा संकाय की अधिष्ठाता प्रो. सुनीता सिरोहा ने अपने वक्तव्य में कहा कि प्रेमचंद ने समाज के यथार्थ स्वरूप को साहित्य में स्थान दिया। उनके साहित्य में समाज की विसंगतियां, आर्थिक असमानता, स्त्री की स्थिति, किसानों का संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत सजीव चित्रण मिलता है। यही कारण है कि प्रेमचंद आज भी हर पीढ़ी के लिए प्रासंगिक हैं और उनका साहित्य समाज को आत्ममंथन की प्रेरणा देता है।
हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. महासिंह पूनिया ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद गांव की आत्मा की आवाज थे। उन्होंने भारतीय ग्रामीण समाज की पीड़ा, संघर्ष, संस्कृति और संवेदनाओं को जिस गहराई से अभिव्यक्त किया, वह हिंदी साहित्य में अद्वितीय है। प्रेमचंद ने किसानों, मजदूरों और आम जनमानस के जीवन को साहित्य का केंद्र बनाकर समाज के उस वर्ग को पहचान दिलाई, जिसकी आवाज लंबे समय तक अनसुनी रही। उनका साहित्य सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय मूल्यों का सशक्त संदेश देता है।
विशिष्ट अतिथि एवं राजकीय पीजी कॉलेज, अंबाला के इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अतुल यादव ने शहीद उधम सिंह के जीवन और बलिदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शहीद उधम सिंह देश के युवाओं के लिए राष्ट्रभक्ति, साहस और संकल्प के अमर प्रतीक हैं। उन्होंने बताया कि उधम सिंह ने अपने जीवन के विभिन्न चरणों में अनेक देशों की यात्राएं कीं और विदेशों में रहते हुए भी भारत की स्वतंत्रता के लिए निरंतर कार्य किया। जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला और उन्होंने उस अमानवीय अत्याचार का प्रतिशोध लेने का संकल्प लिया। वर्षों तक धैर्य और साहस के साथ अपने संकल्प को निभाते हुए उन्होंने जनरल माइकल ओश्ड्वायर को गोली मारकर जलियांवाला बाग के शहीदों के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि उधम सिंह का जीवन युवाओं को देशहित को सर्वाेपरि रखने और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देता है।
संगोष्ठी के दौरान प्रश्नोत्तर सत्र में विद्यार्थियों ने विभिन्न विषयों पर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। इस अवसर पर प्रो. धर्मवीर सिरोही डॉ. जसबीर, डॉ. गुरदीप, डॉ. रामचंद्र, सहित अनेक शिक्षक उपस्थित रहे।
