चरखी दादरी। आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद लाभार्थी से उपचार के नाम पर अस्पताल द्वारा 7.25 लाख रुपये की बड़ी रकम वसूलना सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार है। अस्पताल के ऐसे रवैये से आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों के लिए बनी इस कल्याणकारी योजना का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।
चरखी दादरी उपभोक्ता शिकायत निवारण आयोग के अध्यक्ष मंजीत सिंह नरियाल ने एक याचिकाकर्ता के हक में फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणी की। उन्होंने रोहतक के निजी अस्पताल को 5 लाख रुपये रिफंड करने के आदेश दिए।
साथ ही अस्पताल प्रबंधन को 50 हजार रुपये मानसिक प्रताड़ना व 10 हजार रुपये मुकदमा खर्च के तौर पर अलग से देने होंगे। उपभोक्ता शिकायत निवारण आयोग का यह फैसला आयुष्मान लाभार्थियों के उन पात्रों के लिए उम्मीद की किरण लेकर आया है जो निजी अस्पतालों की मनमानी से आर्थिक उत्पीड़न का शिकार बने हैं।
आयुष्मान योजना का लाभार्थी था मरीज
बता दें कि चरखी दादरी निवासी एक विधवा महिला ने उपभोक्ता शिकायत निवारण आयोग में एक याचिका दायर की थी। इसमें बताया गया था कि 12 जून 2024 को उसके पति को पेट दर्द के साथ सांस लेने में तकलीफ हुई थी। उस दौरान स्वजन उसे भिवानी ले गए और इसके बाद 13 जून को रोहतक के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया।
मरीज आयुष्मान लाभार्थी था और पांच लाख तक का निशुल्क उपचार कराने का पात्र था। बावजूद इसके अस्पताल प्रबंधन ने 7.25 लाख रुपये वसूल लिए और उस दौरान कहा गया कि आयुष्मान योजना के तहत उपचार की स्वीकृति मिलने के बाद पांच लाख रुपये रिफंड कर दिए जाएंगे।
महिला ने लिया उपभोक्ता शिकायत निवारण आयोग का सहारा
उस दौरान महिला ने रिश्तेदारों से रुपये उधार लेकर पति की जान बचाने के लिए अस्पताल में जमा करवा दिए। 25 जून 2024 को मरीज को अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया और अगले ही दिन उसकी मौत हो गई। इसके बाद जब अस्पताल से रिफंड मांगा तो पैसे लौटाने से इंकार कर दिया गया। इसके बाद महिला ने उपभोक्ता शिकायत निवारण आयोग का सहारा लिया।
अस्पताल प्रबंधन ने याचिका को बताया झूठा
उपभोक्ता शिकायत निवारण आयोग के समक्ष अस्पताल ने अपना बचाव करते हुए महिला की याचिका को झूठा बताया। अस्पताल की ओर से तर्क दिया गया कि आयुष्मान योजना के तहत सिर्फ कार्डियोलाजी व कार्डियो-थोरेसिक सर्जरी के पैनल में शामिल है।
मरीज एक्यूट गैस्ट्रोएंटेराइटिस और सेप्सिस से पीड़ित था, इसलिए उसका इलाज योजना के तहत कवर नहीं होता। इलाज से पहले मरीजों को यह बताया गया था और सहमति के बाद नकद भुगतान वाले मरीज के तौर पर भर्ती किया गया था। आयोग ने इन दलीलों को खारिज कर दिया।
