श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक जीवन-प्रबंधन  का मार्गदर्शक है। गीता मानसिक तनाव को दूर कर, कार्यकुशलता, निर्णय लेने की क्षमता, और संतुलित दृष्टिकोण विकसित करने के आधुनिक और शाश्वत सिद्धांत सिखाती है। यह विचार मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने मातृभूमि शिक्षा मंदिर द्वारा आयोजित जीवन प्रबंधन में श्रीमद्भगवद्गीता विषय पर आयोजित गीता संवाद कार्यक्रम में व्यक्त किए। कार्यक्रम का शुभारंभ मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों द्वारा गीता श्लोकोच्चारण के द्वारा हुआ। गीता संवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा  श्रीमद्भगवद्गीता वह दर्पण है जिसमें हम अपने वास्तविक स्वरूप को देख सकते हैं। यह हमें जीवन के ऊपरी संघर्षों के पार ले जाकर आत्मा की शाश्वत शांति, संतुलन और उद्देश्य से जोड़ती है। यदि हम प्रतिदिन गीता के एक श्लोक भी जीवन में उतार लें, तो जीवन की दिशा, दृष्टि और दशा दोनों बदल सकती हैं।
गीता हमे  जीवन को परिणामोन्मुख नहीं, प्रक्रिया मुखी बनाने का संदेश देती है। जब हम परिणाम की चिंता में फँस जाते हैं, तब चिंता, भय और स्थिरता जन्म लेते हैं। किंतु जब हम अपने कर्म में दक्षता, समर्पण और समत्व के साथ लगते हैं, तब जीवन सहज हो जाता है।
यह दृष्टिकोण आज के प्रतिस्पर्धात्मक जीवन में अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ हर व्यक्ति फल की आकांक्षा में कर्म की पवित्रता भूल जाता है।

डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा आधुनिक युग में सबसे बड़ी चुनौती मन की चंचलता है। श्रीमद्भागवत गीता में प्रतिपादित जीवन प्रबंधन. वेदों का सारभूत तत्व है। श्रीमद्भगवद्गीता हमारे जीवन का मूलमंत्र है।गीता का उपदेश नहीं, मानव चेतना के चैतन्य की एक अनुपम स्थिति है।श्रीमद्भगवद्गीता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस ग्रंथ में मानवीय जीवन से जुड़े संदेशों व समस्याओं का निवारण अर्जुन के प्रश्नों के माध्यम से श्री कृष्ण द्वारा किया गया है। बाह्य रूप से देखने पर मनुष्य का जीवन भौतिक रूप से समृद्ध तथा आकर्षक दिखता है किंतु आंतरिक रूप से रिक्तता है  श्रीमद्भगवद्गीता मनुष्य की इन्हीं आंतरिक कमजोरी को दूर कर सशक्त बनाने का माध्यम है ताकि वह आंतरिक रूप से सशक्त बनकर, जीवन को यथार्थ रूप से ग्रहण कर, एक उत्कृष्ट जीवन प्रबंधन द्वारा अपने जीवन को सार्थक बनाकर, राष्ट्र के निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभा सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता मनुष्य के सुप्त विवेक को जागृत करने का साधन है।
कार्यक्रम में रिपुदमन सिंह, अनिरुद्ध जग्गा विशिष्ट अतिथि रहे। कार्यक्रम में पुलकित शर्मा, सुश्री शांभवी, सुरेंद्र सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहें। कार्यक्रम का समापन शांति पाठ से हुआ।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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