नया सम्राट, पुरानी समस्याएँ — क्या बदलेगा बिहार का भाग्य?
बिहार की राजनीतिक धरती ने एक बार फिर इतिहास रचा है। लगभग दो दशक तक बिहार की कमान संभालने वाले नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और भाजपा विधायक दल ने सम्राट चौधरी को अपना नेता चुना।  सम्राट चौधरी बिहार में भारतीय जनता पार्टी के पहले मुख्यमंत्री होंगे, नवंबर 2025 के अभूतपूर्व चुनावी परिणाम में भाजपा बिहार विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी। मुंगेर की माटी से आने वाले 57 वर्षीय सम्राट चौधरी का राजनैतिक कद रातों-रात नहीं बढ़ा — उनके पिता शकुनी चौधरी समता पार्टी के संस्थापकों में से एक और लालू प्रसाद यादव के निकट सहयोगी रहे थे। सम्राट की राजनीतिक यात्रा राजद से प्रारंभ होकर जेडीयू और फिर 2018 में भाजपा तक पहुँची।  तारापुर की माटी से उठे इस नेता के कंधों पर अब बिहार की 13 करोड़ जनता की आकांक्षाओं का बोझ है। राज्याभिषेक तो हो गया — किंतु असली प्रश्न यह है कि क्या सम्राट, बिहार की उन पुरानी और गहरी समस्याओं से पार पा सकेंगे जो दशकों से राज्य को पिछड़ेपन की जंजीरों में जकड़े हुए हैं?
नीतीश कुमार का मूल्यांकन कितना ही विवादास्पद हो, एक तथ्य निर्विवाद है — उन्होंने बिहार को लालू-राबड़ी के जंगलराज से निकालकर सुशासन की एक आधारभूमि दी। सड़कें बनीं, बिजली पहुँची, महिला सशक्तीकरण के कार्यक्रम चले। किंतु उनके दो दशक के शासन का सबसे बड़ा अधूरापन यह रहा कि बिहार आर्थिक स्वावलंबन की दिशा में उस गति से नहीं दौड़ सका, जिसकी उसे दरकार थी। शिक्षा, रोजगार और औद्योगिक विकास — इन तीन मोर्चों पर बिहार आज भी राष्ट्रीय औसत से बहुत पीछे है। सम्राट चौधरी को यह विरासत संभालनी है — और इसमें न केवल पुराने घाव भरने हैं, बल्कि नए संकल्पों का बीजारोपण भी करना है।
बिहार की राजनीति में शराबबंदी एक ऐसा प्रश्न है जो हर दल को असहज करता है। यह फैसला सामाजिक दृष्टि से साहसिक तो है, किंतु राजस्व की दृष्टि से जोखिम भरा है — राज्य सरकार को इससे हर साल 5,000 से 6,000 करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान होता है। कुछ अर्थशास्त्री तो इससे भी बड़ी क्षति का आकलन करते है। आकडों के अनुसार 9 वर्षों में राज्य को एक लाख करोड़ का नुकसान हुआ है और औसतन हर साल 12,000 करोड़ की राजस्व क्षति होती रही है।  दूसरी ओर, लैंसेट पत्रिका में प्रकाशित एक शोध यह दर्शाता है कि 2016 में लागू शराबबंदी से 24 लाख से अधिक मामलों में शराब-सेवन और 21 लाख से अधिक मामलों में घरेलू हिंसा पर नियंत्रण हुआ।  यह आँकड़े यह भी सिद्ध करते हैं कि शराबबंदी के सामाजिक लाभ नगण्य नहीं हैं।
किंतु समस्या यह है कि शराबबंदी कागज़ों पर तो लागू है, व्यवहार में नहीं। अवैध शराब का कारोबार फला-फूला, ज़हरीली शराब से मौतें हुईं, और भ्रष्टाचार का एक नया पारिस्थितिकी तंत्र विकसित हो गया। सम्राट चौधरी के सामने यह कठिन विकल्प है — या तो शराबबंदी को वास्तव में क्रियान्वित करें, या इसकी नीतिगत समीक्षा का साहस दिखाएँ। भाजपा के लिए यह विषय और भी संवेदनशील है क्योंकि महिला वोट बैंक इससे सीधे जुड़ा है। राजनीतिक विश्लेषक प्रशांत किशोर ने भी बिहार में शराबबंदी के जल्द समाप्त होने और आर्थिक संकट की आशंका जताई है । निर्णय जो भी हो — उसके दूरगामी परिणाम होंगे
बिहार की सबसे मर्मांतक पीड़ा उसके श्रमिकों का पलायन है। दिल्ली की निर्माण-स्थलों पर, मुंबई के कारखानों में, पंजाब और हरियाणा के खेतों में — बिहार का युवा दिहाड़ी मज़दूर बनकर काम करता है। यह पलायन केवल आर्थिक नहीं, सांस्कृतिक और सामाजिक क्षय का भी प्रतीक है। प्रत्येक वर्ष लाखों बिहारी अपना घर-परिवार छोड़कर रोज़ी-रोटी की खोज में निकलते हैं। इस पलायन को रोकने का एकमात्र उपाय है — बिहार में उद्योग, और उद्योग के लिए चाहिए बुनियादी ढाँचा, बिजली की निर्बाध आपूर्ति, कानून-व्यवस्था, और निवेशकों का विश्वास।
नीतीश शासन में कुछ प्रयास हुए — इन्वेस्टर्स समिट आयोजित हुए, घोषणाएँ हुईं — किंतु धरातल पर बड़े उद्योग नहीं आए। बिहार में न बंदरगाह है, न समतल भूमि का बड़ा विस्तार उद्योग के लिए उपयुक्त। बाढ़ की वार्षिक विभीषिका अलग है। सम्राट चौधरी को यह समझना होगा कि केवल घोषणाओं से पलायन नहीं रुकता — एक विश्वसनीय औद्योगिक नीति, लघु एवं मध्यम उद्यमों को प्रोत्साहन, और कृषि-आधारित उद्योगों का विकास ही इस समस्या का दीर्घकालिक समाधान है।
बिहार का भविष्य उसकी शिक्षा व्यवस्था की नींव पर टिका है — और यह नींव अभी भी खोखली है। सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी, भवनों का जर्जर होना, मध्याह्न भोजन में अनियमितता, और उच्च शिक्षा के गुणवत्ताहीन संस्थान — ये सब मिलकर बिहारी युवा को पहले दिन से पिछड़ेपन की ओर धकेलते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में बिहार के युवाओं की उपस्थिति उनकी जिजीविषा का प्रमाण है — किंतु यही युवा जब उचित शिक्षा-सुविधाओं से वंचित रहते हैं, तो यह राज्य की नहीं, पूरे देश की क्षति है।
सम्राट चौधरी के लिए यह आवश्यक होगा कि वे शिक्षा को केवल योजनाओं में नहीं, प्राथमिकता के धरातल पर रखें। नालंदा और विक्रमशिला की धरती पर जहाँ कभी विश्व का सर्वश्रेष्ठ ज्ञानकेंद्र था, वहाँ आज की पीढ़ी को उस गौरव की पुनः प्राप्ति करानी है। इसके लिए चाहिए शिक्षकों की नियुक्ति में पारदर्शिता, तकनीकी शिक्षा का विस्तार, और निजी क्षेत्र की भागीदारी।
बिहार को आज भी देश के सर्वाधिक पिछड़े राज्यों में गिना जाता है। प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम है। स्वास्थ्य सुविधाएँ दयनीय हैं। बाढ़ और सूखे का चक्र कृषि को तबाह करता रहता है। इस पिछड़ेपन का कलंक मिटाना केवल संख्याओं का खेल नहीं — यह जन-मानस में आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना का प्रश्न है।
बिहार की राजनीति, जो अपनी अनिश्चितता और अप्रत्याशित मोड़ों के लिए जानी जाती है, ने इस ऐतिहासिक परिवर्तन के साथ एक नया अध्याय खोला है। भाजपा के लिए बिहार अब केवल गठबंधन-धर्म का मैदान नहीं — यह उसकी शासन-क्षमता की वास्तविक परीक्षा है। सम्राट चौधरी को यह सिद्ध करना होगा कि भाजपा केवल सत्ता पाना जानती है, शासन चलाना भी जानती है।
1999 में राबड़ी देवी की सरकार में सबसे कम उम्र के कृषि मंत्री बने सम्राट की राजनीतिक परिपक्वता और विभिन्न दलों में काम करने का अनुभव उन्हें एक व्यापक दृष्टिकोण देता है। यह अनुभव उनकी सबसे बड़ी पूँजी है। किंतु बिहार की समस्याएँ व्यक्तिगत अनुभव से नहीं, नीतिगत साहस से हल होती हैं।
बिहार को एक ऐसे नेतृत्व की प्रतीक्षा है जो न केवल जंगलराज की स्मृति मिटाए, बल्कि विकास-राज की ऐसी इबारत लिखे जिसे आने वाली पीढ़ियाँ याद रखें। सम्राट चौधरी के सामने यह सुनहरा अवसर है, और यही सबसे कठिन परीक्षा भी। बिहार की जनता ने भाजपा को पहली बार सीधे सत्ता सौंपी है। यह विश्वास का मत है। इस विश्वास को यदि नीतियों में नहीं बदला गया, तो बिहार का मतदाता, जो राजनीतिक रूप से भारत का सर्वाधिक जागरूक मतदाता माना जाता है, अगली बार अपना हिसाब अवश्य माँगेगा।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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