-आयुर्वेद केवल डिग्री का विषय नहीं, बल्कि जीवन में उतारने और समाज को स्वस्थ रखने की सतत प्रक्रिया: प्रो.धीमान
-आयुष विभाग द्वारा आयोजित एक दिवसीय आयुर्वेद संवाद में प्रदेशभर के आयुर्वेदिक चिकित्सकों ने लिया हिस्सा
कुरुक्षेत्र। श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान ने कहा कि शास्त्र और रोगी, दोनों ही एक वैद्य के सबसे बड़े गुरु होते हैं। शास्त्रों में लिखा प्रत्येक शब्द अनुभूति से उपजा है और पूर्णत: सार्थक है। एक योग्य वैद्य वह है, जो बिना अधिक औषधियों के भी रोगी को आहार-विहार और उचित परामर्श द्वारा स्वस्थ कर सके। आज दुनियाभर में बड़ी संख्या में लोग केवल जीवनशैली में सुधार कर स्वयं को निरोग बना रहे हैं। कुलपति प्रो. धीमान बुधवार को विश्वविद्यालय के ऑडिटोरियम में आयुष विभाग द्वारा आयोजित एक दिवसीय राज्य स्तरीय आयुर्वेद संवाद (CME) में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।
कार्यक्रम में आयुष विभाग के नोडल अधिकारी डॉ. चंदन दुआ, रिसोर्स पर्सन डॉ. दलीप मिश्रा, डॉ. गोपेश मंगल, श्री धन्वंतरि आयुर्वेदिक कॉलेज के प्राचार्य डॉ. शंकर, एनसीआईएसएम नई दिल्ली से डॉ. अतुल वाषणे, जिला आयुर्वेदिक अधिकारी डॉ. मंजू, डॉ. मोहित गुप्ता सहित अनेक विशेषज्ञ उपस्थित रहे।
कुलपति प्रो. धीमान ने नव-चयनित आयुर्वेदिक चिकित्सा अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि सामाजिक प्रतिष्ठा केवल निरंतर परिश्रम से ही प्राप्त होती है। गीता का प्रथम शब्द ही पुरुषार्थ का प्रतीक है-कर्म ही परिश्रम है और परिश्रम ही पुरुषार्थ है। पुरुषार्थ ही जीवन का मूल मंत्र है, क्योंकि उससे ही शारीरिक, मानसिक और नैतिक बल प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद केवल डिग्री का विषय नहीं, बल्कि जीवन में उतारने और समाज को स्वस्थ रखने की सतत प्रक्रिया है।
प्रो. धीमान ने विद्या बल, चरित्र बल, नीति बल और धर्म बल को वैद्य जीवन के चार महत्वपूर्ण स्तंभ बताते हुए कहा कि इनका अर्जन एक दिन का कार्य नहीं, बल्कि लगातार अनुशासन, सीख और आत्ममंथन से संभव होता है। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में आयुर्वेद की प्रभावशीलता को पूरी दुनिया ने स्वीकार किया। आज विश्व समुदाय आयुर्वेद से आशा रखता है और आयुर्वेद को वैश्विक स्वास्थ्य मॉडल बनाने की जिम्मेदारी हम सबके कंधों पर है।
आयुर्वेद अध्ययन एवं अनुसंधान संस्थान के प्राचार्य प्रो. आशीष मेहता ने कहा कि आयुर्वेदिक चिकित्सा अधिकारियों को निरंतर अध्ययन, अनुशासन और संवेदनशीलता को अपने व्यावसायिक जीवन का आधार बनाना चाहिए। एक वैद्य का व्यक्तित्व केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि उसके आचरण, विनम्रता और रोगी के प्रति करुणा से पहचाना जाता है। प्रो. मेहता ने सभी नव-चयनित अधिकारियों से आग्रह किया कि वे परंपरा और आधुनिकता के संतुलन के साथ आयुर्वेद को समाज तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं। इस अवसर पर आयुष विश्वविद्यालय के प्रो.रवि राज, प्रो.सीमा रानी,प्रो.विदुषी त्यागी,प्रो.कृष्ण कुमार,प्रो.शीलत सिंगला समेत अन्य शिक्षक एवं आयुष विभाग के अधिकारी उपस्थित रहें।
