अंबाला। अंबाला रेल मंडल के अधीन कालका रेलवे स्टेशन पर लोडिंग-अनलोडिंग को लेकर मजदूरों की लेबर में बंदरबांट को लेकर हुए झगड़े के मामले में अब अंबाला रेल मंडल के अफसरों ने एक्शन लिया है। कालका के सीपीएस का तबादला मोहाली कर दिया गया है, जबकि एएसआइ को कालका से हटाने के लिए उत्तर रेलवे के मुख्यालय पत्र लिखा गया है।

मंडल स्तर पर एएसआई का तबादला करने की शक्तियां नहीं है, इसलिए आईजी को चिटठी लिखी गई है। एएसआई को पहले ही चार्जशीट जारी की जा चुकी है। मामला सुर्खियों में आने के बाद सीपीएस और एएसआइ को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया था और जांच का जिम्मा आरपीएफ के असिस्टेंट कमिश्नर और डीसीएम को दिया गया था।

हालांकि जांच के बीच में दोनों को बहाल कर दिया गया। इस पूरे प्रकरण में रेलवे की छवि खराब हुई है। यह सारा विवाद कालका स्टेशन पर लोडिंग अनलोडिंग की मजदूरी में बंदरबांट को लेकर हुआ था।

जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद स्पष्ट होगा कि जांच अधिकारियों ने इस झगड़े की तय में जांच की या नहीं? सबसे अहम पहलू है कि दोनों के बीच में झगड़े का मुख्य कारण क्या रहा? जिस कारण रेलवे की छवि धूमिल हुई।

कालका स्टेशन पर लोडिंग-अनलोडिंग को लेकर आये दिन विवाद हो रहे हैं, लेकिन इसको लेकर भी समाधान नहीं हुआ। यहां तक कि रेलवे ने खुद प्राइवेट लेबर से सुरक्षा और संरक्षा को खतरा बताया था और पुलिस वेरिफिकेशन के बिना कोई भी लेबर माल नहीं चढ़ाएगी, इसको लेकर आदेश जारी किए थे।

बता दें कि कालका रेलवे स्टेशन पर लोडिंग-अनलोडिंग को लेकर हुए विवाद में आरपीएफ के एएसआई और सीपीएस के बीच झड़प हो गई थी। दोनों को सस्पेंड कर दिया गया था। दोनों अधिकारियों ने स्टेशन पर पहुंचकर जांच की और सीसीटीवी फुटेज भी खंगाली। करीब एक माह पहले दोनों अधिकारियों ने सीसीटीवी फुटेज और दोनों के बयान दर्ज कर अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी।

स्टेशन पर अवैध लेबर आने के लिए कौन जिम्मेदार

स्टेशन पर अवैध लेबर आने के लिए कौन जिम्मेदार है। जांच अधिकारियों को अपनी रिपोर्ट में इसका भी जिक्र करना चाहिए था। दरअसल, रेल में मालढुलाई ही रेलवे में बड़ी आमदनी जरिया है। लेकिन ट्रेनों में माल की लोडिंग और अनलोडिंग करने के लिए न तो कर्मचारी हैं और न ही इसका ठेका किसी को दे रखा है।

ऐसे में अवैध रूप से बाहर की लेबर से लोडिंग और अनलोडिंग करवाई जा रही है। एक-एक ट्रेन में सैंकड़ों हजारों नग आते हैं। प्रत्येक नग के हिसाब से लेबर का बिल बना दिया जाता है और इस बिल में पचास प्रतिशत तक कमीशन का खेल खेला जाता है।

जो ठेकेदार अधिक रुपये देगा, उसी की लेबर को लोडिंग अनलोडिंग की अनुमति दी जाती है। यदि कोई खुद माल लोड या अनलोड करायेगा तो इसको लेकर झगड़ा तय है।

लोडिंग को एक ओर आया था विवाद

रेलवे में पहले लगेज पोर्टर ही सामान लोड करवाते थे। धीरे-धीरे लगेज पोर्टराें की संख्या कम होती चली गई, जिसके चलते पार्सल चढ़ाने वाले ही नहीं बचे। ऐसे में प्राइवेट लेबर के माध्यम से सामान को चढ़ाने की अनुमति दी गई। जो कारोबारी लीज़ लेकर माल ढुलाई कर रहे हैं, उनको अनुमति दी कि वे अपनी लेबर लाकर सामान को उतरवा और चढ़वा सकते हैं।

इसी के चलते दूसरी लेबर का रास्ता भी खुल गया। अब आलम यह है कि ठेकेदार अपनी लेबर लाते हैं और दूसरे कारोबारियों का माल भी बाहरी लेबर से चढ़वाते हैं। हालांकि नियमों के अनुसार प्लेटफार्म पर यह लेबर आ नहीं सकती, लेकिन यहां पर खाकी भी माया के जाल में उलझी है, इसलिए रोक नहीं पाती।

ठेकेदार प्रत्येक नग के बीस रुपये के हिसाब से चार्ज करता है, जबकि दूसरी लेबर दस रुपये के अनुसार प्रत्येक नग के लेती है। हाल ही में कालका स्टेशन पर 95 नग उतारे गए थे, जिसकी लेबर बीस रुपये प्रति नग के हिसाब से मांगी गई। इसी को लेकर विवाद हो गया और कारोबारी ने कहा कि जब दस रुपये लेबर के दिए जाते हैं, तो बीस रुपये क्यों।

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