श्रीलंका में 18 से अधिक स्थानों का संबंध रामायण सेः प्रो. महासिंह पूनिया
कुवि हिंदी विभाग में श्रीलंका के विद्वान ने सांझा अंतिला ने दिया व्याख्यान
कुरुक्षेत्र, 30 अक्टूबर। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में हिंदी विभाग द्वारा साहित्यिक क्लब के अंतर्गत विदेशों में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में श्रीलंका के हिंदी संस्थान के संस्थापक निदेशक एवं विशिष्ट अतिथि अंतिला कोतलावल ने शिरकत की। इस अवसर पर उन्होंने विदेशों में हिंदी भाषा के शिक्षण, प्रचार-प्रसार, अनुवाद तथा रोजगार की संभावनाओं पर अपने अनुभव और विचार साझा किए।
अपने संबोधन में अंतिला कोतलावल ने बताया कि उन्होंने हिंदी फिल्मी गीतों और रेडियो पर प्रसारित होने वाले हिंदी कार्यक्रमों के माध्यम से हिंदी भाषा सीखी। उन्होंने जानकारी दी कि श्रीलंका के लगभग 80 विद्यालयों में ऐच्छिक विषय के रूप में हिंदी पढ़ाई जाती है। इसके साथ ही कला धारा के अंतर्गत भी हिंदी भाषा को स्थान दिया गया है। श्रीलंका में भारतीय उच्चायोग एवं अन्य भारतीय संस्थाएं हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। भारतीय दूतावास के सहयोग से उपलब्ध करवाई जाने वाली हिंदी की पुस्तकें वहां के विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हो रही हैं।
उन्होंने बताया कि श्रीलंका में हिंदी धारावाहिकों का स्थानीय भाषा में अनुवाद करके प्रसारण किया जाता है तथा हिंदी अनुवाद के क्षेत्र में भी व्यापक संभावनाएं हैं। रोजगार के संदर्भ में उन्होंने कहा कि वहां के लोग चीनी भाषा को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन हिंदी भी एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में उभर रही है। भारत से बड़ी संख्या में पर्यटक श्रीलंका पहुंचते हैं, जिससे दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक एवं पर्यटन संबंधों को मजबूती मिल रही है। उन्होंने कहा कि भारत और हिंदी से जुड़ी संस्थाएं यदि योजनाबद्ध तरीके से विशेष अभियान चलाएं तो हिंदी के माध्यम से रोजगार के नए अवसर सृजित किए जा सकते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को श्रीलंका आने तथा रामायण सहित भारतीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक ग्रंथों पर शोध करने के लिए आमंत्रित किया। इस अवसर पर उन्होंने अपनी कविता की पंक्तियों के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक विरासत का स्मरण करते हुए कहा, ष्कैसे भुलाया जा सकता है आगरा का ताजमहल, दिल्ली का लाल किला।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हिंदी विभाग के अध्यक्ष एवं लोक सम्पर्क विभाग के निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया ने कहा कि श्रीलंका के साथ भारत का सदैव से संवेदनात्मक एवं सांस्कृतिक संबंध रहा है। विदेशी विद्वानों के अनुभवों और विचारों से विद्यार्थियों के ज्ञान एवं दृष्टिकोण का विस्तार होता है। हिंदी भारत और श्रीलंका के बीच एक सशक्त सांस्कृतिक सेतु का कार्य कर रही है। उन्होंने विद्यार्थियों को हिंदी को रोजगार की भाषा के रूप में अपनाने तथा इसमें उपलब्ध संभावनाओं को तलाशने के लिए प्रेरित किया। साथ ही शोधार्थियों से हिंदी शोध के नए आयाम विकसित करने का आह्वान किया।
प्रो. महासिंह पूनिया ने कहा कि भारतीय और श्रीलंकाई संस्कृति के बीच गहरा संबंध है। हमें हिंदी के प्रति अपनी उदासीनता छोड़कर इसे पूरे मन से अपनाना चाहिए। अंतिला कोतलावल इसका प्रेरणादायी उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने प्रयासों और लगन से हिंदी भाषा के प्रति विशेष लगाव विकसित किया है।
कार्यक्रम के अंत में विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. जसबीर सिंह ने अतिथियों एवं उपस्थितजनों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का सफल मंच संचालन शोधार्थी रचना पूनिया ने किया। इस अवसर पर हिंदी विभाग के शिक्षक, विद्यार्थी एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।
