कुरुक्षेत्र, 23 जुलाई। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग-मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्र एवं पर्यावरण अध्ययन संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग प्रायोजित दो-सप्ताहीय बहु विषयक रिफ्रेशर पाठ्यक्रम “पर्यावरणीय चुनौतियाँ एवं सततता पर क्रियान्वयन” के दूसरे दिन पर्यावरण संरक्षण, आपदा प्रबंधन, अपशिष्ट निस्तारण तथा जैव विविधता संरक्षण से संबंधित समसामयिक विषयों पर चार तकनीकी व्याख्यान आयोजित किए गए। इनमें देश के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों एवं विशेषज्ञों ने अपने विचार प्रस्तुत किए।
प्रथम तकनीकी सत्र में प्रो. वी.के. गर्ग ने कृषि, चिकित्सा, उद्योग तथा पर्यावरणीय निगरानी के क्षेत्रों में नाभिकीय विकिरण के शांतिपूर्ण उपयोगों की जानकारी देते हुए कहा कि नाभिकीय प्रौद्योगिकी सतत विकास एवं मानव कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक उपलब्धियों का सकारात्मक उपयोग समाज और पर्यावरण के हित में किया जाना चाहिए। द्वितीय तकनीकी सत्र में प्रो. दिनेश कुमार ने भूकंप के कारणों, प्रभावों तथा उससे उत्पन्न जोखिमों की विस्तार से चर्चा करते हुए आपदा पूर्व तैयारी, जोखिम न्यूनीकरण तथा वैज्ञानिक नियोजन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सुदृढ़ आधारभूत संरचना तथा जन-जागरूकता के माध्यम से भूकंप से होने वाली क्षति को काफी हद तक कम किया जा सकता है। तृतीय तकनीकी सत्र में प्रो. भूपेन्द्र ने बढ़ते ठोस अपशिष्ट से उत्पन्न पर्यावरणीय समस्याओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन वर्तमान समय की आवश्यकता है। उन्होंने संसाधनों की पुनर्प्राप्ति, पुनर्चक्रण, परिपत्र अर्थव्यवस्था तथा जनसहभागिता को पर्यावरणीय सततता प्राप्त करने के लिए अत्यंत आवश्यक बताया। चतुर्थ एवं अंतिम तकनीकी सत्र में प्रो. डेज़ी बातिश ने “आक्रामक पौधे एवं उनका सतत उपायों द्वारा प्रबंधन” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि बाहरी आक्रामक पौधों की प्रजातियाँ जैव विविधता तथा पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन रही हैं। उन्होंने इनके पारिस्थितिक एवं आर्थिक दुष्प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए इनके नियंत्रण एवं दीर्घकालिक प्रबंधन के लिए सतत और वैज्ञानिक उपाय अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. पूजा ने सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त किया। सह-समन्वयक डॉ. भावना दहिया ने प्रतिभागियों को अगले दिन आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा एवं समय-सारिणी की जानकारी प्रदान की। कार्यक्रम में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से आए शिक्षकों की सक्रिय सहभागिता रही।
प्रथम तकनीकी सत्र में प्रो. वी.के. गर्ग ने कृषि, चिकित्सा, उद्योग तथा पर्यावरणीय निगरानी के क्षेत्रों में नाभिकीय विकिरण के शांतिपूर्ण उपयोगों की जानकारी देते हुए कहा कि नाभिकीय प्रौद्योगिकी सतत विकास एवं मानव कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक उपलब्धियों का सकारात्मक उपयोग समाज और पर्यावरण के हित में किया जाना चाहिए। द्वितीय तकनीकी सत्र में प्रो. दिनेश कुमार ने भूकंप के कारणों, प्रभावों तथा उससे उत्पन्न जोखिमों की विस्तार से चर्चा करते हुए आपदा पूर्व तैयारी, जोखिम न्यूनीकरण तथा वैज्ञानिक नियोजन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सुदृढ़ आधारभूत संरचना तथा जन-जागरूकता के माध्यम से भूकंप से होने वाली क्षति को काफी हद तक कम किया जा सकता है। तृतीय तकनीकी सत्र में प्रो. भूपेन्द्र ने बढ़ते ठोस अपशिष्ट से उत्पन्न पर्यावरणीय समस्याओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन वर्तमान समय की आवश्यकता है। उन्होंने संसाधनों की पुनर्प्राप्ति, पुनर्चक्रण, परिपत्र अर्थव्यवस्था तथा जनसहभागिता को पर्यावरणीय सततता प्राप्त करने के लिए अत्यंत आवश्यक बताया। चतुर्थ एवं अंतिम तकनीकी सत्र में प्रो. डेज़ी बातिश ने “आक्रामक पौधे एवं उनका सतत उपायों द्वारा प्रबंधन” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि बाहरी आक्रामक पौधों की प्रजातियाँ जैव विविधता तथा पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन रही हैं। उन्होंने इनके पारिस्थितिक एवं आर्थिक दुष्प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए इनके नियंत्रण एवं दीर्घकालिक प्रबंधन के लिए सतत और वैज्ञानिक उपाय अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. पूजा ने सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त किया। सह-समन्वयक डॉ. भावना दहिया ने प्रतिभागियों को अगले दिन आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा एवं समय-सारिणी की जानकारी प्रदान की। कार्यक्रम में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से आए शिक्षकों की सक्रिय सहभागिता रही।
