चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत गठित मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल द्वारा पारित एक महत्वपूर्ण आदेश को अधिकार क्षेत्र के अभाव में रद कर दिया है।
अदालत ने कहा कि जब राज्य सरकार की अधिसूचना के अनुसार ट्रिब्यूनल तीन सदस्यों वाला निकाय है तो उसका फैसला अकेले एसडीएम द्वारा नहीं दिया जा सकता। ऐसा आदेश कानून की नजर में शून्य माना जाएगा।
जस्टिस कुलदीप तिवारी ने सोनीपत निवासी महिला द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिका में 11 जून 2018 और 10 जनवरी 2020 को मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल तथा 21 नवंबर 2019 को अपीलीय ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आदेशों को चुनौती दी गई थी।
मामले के अनुसार वरिष्ठ नागरिक महिला ने अपने पुत्र और अन्य संबंधित पक्षों के खिलाफ मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल में आवेदन दायर कर संपत्ति से बेदखली तथा उनके पक्ष में निष्पादित ट्रांसफर और रिलीज डीड रद करने की मांग की थी। ट्रिब्यूनल ने आवेदन स्वीकार करते हुए डीड रद करने की सिफारिश की थी।
इसके खिलाफ याचिकाकर्ता महिला ने अपील दायर की, लेकिन अपीलीय ट्रिब्यूनल ने भी उसकी अपील खारिज कर दी और संपत्ति का कब्जा वरिष्ठ नागरिक महिला को लौटाने के निर्देश दे दिए।
बाद में संबंधित डीड भी रद कर दी गई। हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि हरियाणा सरकार की 17 नवंबर 2016 की अधिसूचना के अनुसार मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल तीन-तीन सदस्यों वाले निकाय हैं, जिनके अध्यक्ष एसडीएम और उपायुक्त होते हैं। ऐसे में अकेले एसडीएम द्वारा पारित आदेश वैध नहीं माना जा सकता।
राज्य सरकार और वरिष्ठ नागरिक महिला की ओर से पेश वकीलों ने भी इस तथ्य का विरोध नहीं किया कि 11 जून 2018 का आदेश निर्धारित पीठ की बजाय अकेले अधिकारी द्वारा पारित किया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि अधिसूचना में निर्धारित संरचना का पालन किए बिना दिया गया आदेश अधिकार क्षेत्र से परे है और उसे कानूनी कायम नहीं रखा जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि अपीलीय ट्रिब्यूनल ने इस मूलभूत कानूनी खामी को नजरअंदाज करते हुए अपील खारिज कर दी, इसलिए उसका आदेश भी टिक नहीं सकता।
अदालत ने मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल के सभी विवादित आदेश रद्द करते हुए मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल को वापस भेज दिया। ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया गया कि वर्ष 2018 से लंबित विवाद का निपटारा चार माह के भीतर करने का प्रयास किया जाए। साथ ही अंतिम निर्णय तक संबंधित संपत्ति पर किसी भी प्रकार के तीसरे पक्ष के अधिकार सृजित नहीं किए जाएंगे।
