माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरुजी का जीवन अध्यात्म, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सामाजिक समरसता और निस्वार्थ समाज सेवा का एक अनूठा संगम था। उनका संपूर्ण जीवन भारत की एकाग्रता, हिंदुत्व की विचारधारा और राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित था। वे भारत को केवल एक राजनीतिक मानचित्र या भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक प्राचीन और जीवंत सांस्कृतिक इकाई मानते थे। उनके जीवन दर्शन में हिंदुत्व जीवन जीने की एक पद्धति और राष्ट्रीय एकता का आधार था। यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक  माधव सदाशिवराव गोलवलकर की जयंती के उपलक्ष्य में मातृभूमि शिक्षा मंदिर द्वारा आयोजित सनातन संवाद कार्यक्रम में मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने व्यक्त किए। कार्यक्रम का शुभारंभ श्री गुरुजी के चित्र के समक्ष मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों ने दीप प्रज्वलन से किया। सनातन संवाद कार्यक्रम में मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों ने प्रेरक प्रसंगों की प्रस्तुति दी।
सनातन संवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डा.श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा श्री गुरुजी एक निर्भीक विचारक थे। उन्होंने संघ के अनेक अनुषांगिक संगठनों एवं प्रमुख संस्थाओं की नींव  रखी। वे अपने ज्ञान, कुशाग्र बुद्धि और संवाद की शैली के लिए प्रसिद्ध थे। जिससे भी एक बार मिला, वह व्यक्ति जीवन भर उन्हें याद रखता। श्री गुरुजी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपने दृढ़ संकल्प से सन् 1940 से 1973 तक इन 33 वर्षों में श्री गुरुजी ने संघ को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया। अपने 33 वर्षों के कार्यकाल में 66 बार भारत का भ्रमण कर देश के कोने कोने से जुड़े। उनका जीवन स्वयं एक चलती फिरती पाठशाला थी।  श्री गुरुजी का जीवन अलौकिक था, राष्ट्र जीवन के विभिन्न पहलुओं पर उन्होंने मूलभूत एवं क्रियाशील मार्गदर्शन किया। वास्तविक रूप से  श्री गुरू जी का जीवन राष्ट्रऋषि के समान था।
डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा श्री गुरुजी के जीवन एवं विचारों पर स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस और महर्षि अरविंद का गहरा प्रभाव थ। उसका सम्पूर्ण सामाजिक चिंतन राष्ट्र की एकता और सांस्कृतिक उत्थान के लिए समर्पित था। भारत विभाजन के समय उन्होंने न केवल संगठन को मजबूती दी, बल्कि कई स्थानों पर स्वयं सेवकों के नेतृत्व में हिंदुओं की जान बचाने का कार्य भी किया। वे भारत के चारों शंकराचार्यों को एक मंच पर लाने वाले अद्भुत विचारक थे। उन्होंने यह उद्घोष किया कि सभी हिंदू एक ही माता के संतान हैं, कोई हिंदू पतित नहीं है। आज जब हम भारत के पुनरुत्थान की बात करते हैं, तो गुरु गोलवलकर जी जैसे व्यक्तित्व हमारे लिए प्रेरणा स्रोत बनते हैं। उनके अनुसार, समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण केवल कुछ लोगों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति का एक नैतिक कर्तव्य है। इस अवसर पर विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में मातृभूमि सेवा मिशन के शिक्षक, विद्यार्थी आदि उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन वन्देमातरम से हुआ।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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