कुरुक्षेत्र, 22 मई। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में यूजीसी-मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र द्वारा आयोजित एनईपी अभिविन्यास और संवेदीकरण कार्यक्रम के चौथे दिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति में परिकल्पित समावेशी एवं समग्र शिक्षा पर केंद्रित शैक्षणिक सत्र आयोजित किए गए। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने छात्र विविधता, समावेशी शिक्षा तथा भारतीय ज्ञान प्रणाली की प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार साझा किए।
पहले सत्र में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रबंधन अध्ययन संस्थान के उप-निदेशक डॉ. राजन शर्मा ने कहा कि विविध सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषाई और आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों को समझते हुए समावेशी शिक्षण वातावरण तैयार करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने समग्र एवं बहु-विषयक शिक्षा को विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया तथा भारतीय ज्ञान प्रणालियों की समकालीन शिक्षा में उपयोगिता पर प्रकाश डाला।
दूसरे सत्र में मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी की प्रबंधन एवं वाणिज्य विभाग की प्रोफेसर समीम फातिमा ने “छात्र विविधता और समावेशी शिक्षा” विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि शिक्षकों की भूमिका केवल ज्ञान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि कक्षाओं में संवेदनशीलता, सहानुभूति और समावेशी दृष्टिकोण विकसित करना भी आवश्यक है। उन्होंने संस्थानों से विद्यार्थियों की विभिन्न सीखने की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए लचीली एवं छात्र-अनुकूल शिक्षण पद्धतियां अपनाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम का समापन यूजीसी-मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र की निदेशक प्रो. प्रीति जैन तथा पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. अंजू बाला द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
पहले सत्र में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रबंधन अध्ययन संस्थान के उप-निदेशक डॉ. राजन शर्मा ने कहा कि विविध सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषाई और आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों को समझते हुए समावेशी शिक्षण वातावरण तैयार करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने समग्र एवं बहु-विषयक शिक्षा को विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया तथा भारतीय ज्ञान प्रणालियों की समकालीन शिक्षा में उपयोगिता पर प्रकाश डाला।
दूसरे सत्र में मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी की प्रबंधन एवं वाणिज्य विभाग की प्रोफेसर समीम फातिमा ने “छात्र विविधता और समावेशी शिक्षा” विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि शिक्षकों की भूमिका केवल ज्ञान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि कक्षाओं में संवेदनशीलता, सहानुभूति और समावेशी दृष्टिकोण विकसित करना भी आवश्यक है। उन्होंने संस्थानों से विद्यार्थियों की विभिन्न सीखने की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए लचीली एवं छात्र-अनुकूल शिक्षण पद्धतियां अपनाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम का समापन यूजीसी-मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र की निदेशक प्रो. प्रीति जैन तथा पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. अंजू बाला द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
