चंडीगढ़। पुलिस थानों और जांच एजेंसियों में सीसीटीवी कैमरों लगे होना कागजी दावा है या वास्तव में व्यवस्था धरातल पर काम कर रही है, इस अहम सवाल पर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने बुधवार को पंजाब, हरियाणा और यूटी चंडीगढ़ प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्देशों के बावजूद यदि कैमरे लगे हैं लेकिन फुटेज सुरक्षित नहीं, कैमरे बंद पड़े हैं या निगरानी तंत्र कमजोर है, तो यह न्यायिक आदेशों की गंभीर अवहेलना मानी जाएगी।
जस्टिस विनोद एस भारद्वाज की पीठ ने राज्य स्तरीय निगरानी समितियों को निर्देश दिया कि वे शपथपत्र के माध्यम से विस्तृत जानकारी दें कि कितने पुलिस थानों, जांच इकाइयों और एजेंसियों में सीसीटीवी कैमरे स्थापित किए गए, कितनी जगह छह माह तक फुटेज सुरक्षित रखने की व्यवस्था है, निगरानी का वास्तविक तंत्र क्या है और पिछले पांच वर्षों में जिला स्तरीय समितियों से मिली रिपोर्टों में कौन-कौन सी कमियां या विसंगतियां सामने आईं।
वास्तविक स्थिति का सामने आना जरूरी
हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह मुद्दा “अत्यंत महत्वपूर्ण” है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि केवल कैमरे लगाना पर्याप्त नहीं, बल्कि फुटेज का न्यूनतम छह महीने तक सुरक्षित रहना भी अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि अब वास्तविक स्थिति सामने आनी चाहिए ताकि यह तय हो सके कि सुरक्षा और जवाबदेही की यह व्यवस्था व्यवहार में कितनी प्रभावी है।
सुनवाई के दौरान एमिक्स क्यूरी क्षितिज शर्मा ने अदालत को बताया कि केंद्रीय निगरानी निकाय द्वारा समय-समय पर जारी किए जाने वाले निर्देश सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध नहीं हैं, जबकि आठ वर्षों में दिशा-निर्देशों का अभाव समझ से परे है।
उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि लगभग रोज ऐसे मामले आते हैं, जहां राज्य यह कहकर जवाब देता है कि सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं या कैमरे काम नहीं कर रहे। इससे पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
निर्देशों का वास्तविक पालन कैसे हुआ, बताएं…
इस पर अदालत ने पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ से कहा कि वे न केवल निर्देशों का पूरा रिकॉर्ड प्रस्तुत करें, बल्कि यह भी स्पष्ट करें कि उन निर्देशों का वास्तविक पालन कैसे हुआ। अदालत ने आदेश दिया कि यह हलफनामा सचिव स्तर से कम अधिकारी द्वारा दाखिल नहीं किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 22 मई को होगी।
