15 मई के बाद तैयार करें धान की नर्सरी, 15 जुलाई के बाद करें रोपाई
कुरुक्षेत्र, 27 अप्रैल। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के उप निदेशक डा. आदित्य प्रताप डबास ने कहा कि जिला में अप्रैल माह के दौरान तापमान लगभग 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, जो सामान्य से अधिक है और हीट वेव की स्थिति को दर्शाता है। इस परिस्थिति में खरीफ फसलों, विशेषकर धान, के प्रबंधन में विशेष सावधानी आवश्यक है ताकि उत्पादन हानि एवं जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन से बचा जा सके।
उन्होंने कहा कि किसान अपने खेत में धान की नर्सरी 15 मई से पहले न बोई जाए। अधिक तापमान के कारण अंकुरण प्रभावित होता है तथा पौध कमजोर रहती है। इसी प्रकार धान की रोपाई 15 जून के बाद ही करें, जिससे मानसून वर्षा का लाभ मिल सके। बुवाई या रोपाई केवल तभी करें जब पर्याप्त वर्षा हो या खेत में उचित नमी उपलब्ध हो, क्योंकि जल्दबाजी में रोपाई करने से फसल को नुकसान होने की संभावना रहती है।
उन्होंने कहा कि कम अवधि (शॉर्ट ड्यूरेशन) वाली धान किस्मों का चयन करें, जिससे कम पानी में भी बेहतर उत्पादन लिया जा सके। इसके साथ ही डायरेक्ट सीडेड राइस (ष्ठस्क्र) तकनीक को बढ़ावा दें, जिससे लगभग 25-30 प्रतिशत तक सिंचाई जल/भूमिगत जल की बचत संभव है तथा श्रम लागत भी कम होती है। जल संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए भूमिगत जल का संतुलित उपयोग करें। उन्होंने कहा कि धान के विकल्प के रूप में मक्का, बाजरा, दालें एवं तिलहन फसलें अपनाना वर्तमान परिस्थितियों में अधिक लाभकारी है। जहां संभव हो वहां ड्रिप एवं स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का उपयोग करें।
उन्होंने कहा कि बिजली आपूर्ति के प्रभावी उपयोग के लिए ट्यूबवेल, मोटर व अन्य कृषि यंत्रों की नियमित मेंटेनेंस सुनिश्चित करें, ताकि किसी भी प्रकार की तकनीकी खराबी से बचा जा सके। फसलों में नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग, हल्की एवं समयानुसार सिंचाई (विशेषकर शाम के समय) अपनाएं। उन्होंने कहा कि मानव के साथ ही फसलों और पशुधन की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पशुओं के लिए छाया, स्वच्छ व ठंडा पानी उपलब्ध कराएं तथा दोपहर के समय उन्हें बाहर न रखें। खेतों में कार्य प्रात: व सायंकाल के समय ही करें ताकि लू के दुष्प्रभाव से बचा जा सके। उन्होंने किसानों से अनुरोध करते हुए कहा कि वे मौसम आधारित वैज्ञानिक सलाह का पालन करें और जल संरक्षण उपाय अपनाकर सतत कृषि की दिशा में योगदान दें।
