(अमीरों की सादगी से बदलेगी शादी की सोच)
– डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत में शादी सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं बल्कि एक बड़ा सामाजिक आयोजन भी माना जाता है। यहाँ शादी में परिवार, रिश्तेदार, दोस्त और पूरा समाज शामिल होता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में शादियों का स्वरूप बहुत बदल गया है। आजकल कई शादियाँ इतनी भव्य और महंगी हो गई हैं कि उनमें करोड़ों रुपये तक खर्च किए जाते हैं। बड़े-बड़े होटल, महंगे कपड़े, विदेशी सजावट, मशहूर कलाकारों के कार्यक्रम और कई दिनों तक चलने वाले समारोह अब आम बात हो गए हैं।
ऐसी शादियों का सबसे बड़ा प्रभाव समाज के मध्यम और गरीब वर्ग पर पड़ता है। जब समाज में अमीर लोग बहुत महंगी शादियाँ करते हैं तो बाकी लोगों पर भी वैसी ही शादी करने का दबाव बनने लगता है। कई परिवार अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करने लगते हैं। कई बार तो लोग कर्ज लेकर शादी करते हैं ताकि समाज में उनकी प्रतिष्ठा बनी रहे। यही कारण है कि आज शादी कई परिवारों के लिए खुशी के साथ-साथ आर्थिक बोझ भी बन जाती है।
ऐसे समय में समाज के बड़े और संपन्न लोगों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। अगर जिन लोगों के पास बहुत पैसा है वे सादगी से शादी करें, तो यह पूरे समाज के लिए एक अच्छा उदाहरण बन सकता है। इससे यह संदेश जाएगा कि शादी की खुशी दिखावे या खर्च से नहीं बल्कि रिश्तों और संस्कारों से होती है।
इतिहास में हमें ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जहाँ बड़े और सम्मानित लोगों ने सादगी को महत्व दिया। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की शादी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। उन्होंने दहेज लेने से साफ मना कर दिया था और केवल एक चरखा और कुछ कपड़े ही स्वीकार किए थे। उस समय भी समाज में दहेज और खर्च की परंपरा थी, लेकिन उन्होंने सादगी और सिद्धांतों को प्राथमिकता दी।
इसी तरह प्रसिद्ध उद्योगपति नारायण मूर्ति और समाजसेवी लेखिका सुधा मूर्ति की शादी भी बहुत साधारण तरीके से हुई थी। उस समय उनके पास बहुत अधिक पैसा नहीं था, लेकिन बाद में जब वे बहुत सफल और संपन्न बने तब भी उन्होंने हमेशा सादगी और जिम्मेदारी का संदेश दिया। सुधा मूर्ति अक्सर कहती हैं कि शादी में फिजूल खर्च करने के बजाय पैसा शिक्षा और समाज सेवा में लगाया जाना चाहिए।
इसके विपरीत आधुनिक समय में कुछ शादियाँ इतनी भव्य हो गई हैं कि वे एक तरह से प्रदर्शन का माध्यम बन जाती हैं। उदाहरण के लिए अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट की शादी पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनी। इसी तरह ईशा अंबानी और आनंद पीरामल की शादी भी बहुत बड़े स्तर पर आयोजित की गई थी। इन शादियों में कई बड़े उद्योगपति, अंतरराष्ट्रीय कलाकार और फिल्म सितारे शामिल हुए।
हालाँकि यह भी सच है कि जिन लोगों के पास पैसा है, वे अपनी खुशी के लिए खर्च करने का अधिकार रखते हैं। बड़ी शादियों से होटल उद्योग, सजावट, कैटरिंग, संगीत, फोटोग्राफी और कई अन्य क्षेत्रों में हजारों लोगों को रोजगार भी मिलता है। इसलिए पूरी तरह से बड़ी शादियों की आलोचना करना भी उचित नहीं है।
फिर भी समाज के हित को ध्यान में रखते हुए यह अपेक्षा की जाती है कि बड़े और प्रभावशाली लोग संतुलन बनाए रखें। अगर वे सादगी और जिम्मेदारी का उदाहरण प्रस्तुत करेंगे तो समाज में सकारात्मक बदलाव आ सकता है। जब लोग देखेंगे कि अमीर परिवार भी साधारण तरीके से शादी कर रहे हैं, तो मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग पर अनावश्यक खर्च करने का दबाव कम हो जाएगा।
आज भारत में कई युवा भी इस विषय पर नए विचार अपना रहे हैं। वे सादगी से शादी करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। कुछ लोग मंदिर में विवाह करते हैं, कुछ लोग कोर्ट मैरिज करते हैं और उसके बाद परिवार के साथ छोटा सा कार्यक्रम रखते हैं। इससे खर्च कम होता है और शादी का मूल उद्देश्य भी बना रहता है।
साधारण शादी के कई फायदे भी हैं। सबसे पहला फायदा यह है कि परिवार को आर्थिक बोझ नहीं उठाना पड़ता। कई बार शादी के खर्च के कारण परिवार वर्षों तक कर्ज में डूबे रहते हैं। अगर शादी सादगी से हो तो यह समस्या कम हो सकती है। दूसरा फायदा यह है कि पैसा बचाकर उसे किसी उपयोगी काम में लगाया जा सकता है, जैसे बच्चों की शिक्षा, घर की जरूरतें या समाज सेवा।
इसके अलावा सादगी से शादी करने से सामाजिक समानता का संदेश भी जाता है। समाज में अमीर और गरीब के बीच जो दिखावे की खाई बढ़ रही है, उसे कम करने में भी यह मददगार हो सकता है।
मीडिया और सोशल मीडिया का भी इस विषय में बड़ा प्रभाव है। आजकल शादी की तस्वीरें और वीडियो इंटरनेट पर बहुत तेजी से फैलते हैं। जब लोग भव्य और महंगी शादियाँ देखते हैं तो उनके मन में भी वैसी ही शादी करने की इच्छा पैदा होती है। इसलिए जरूरी है कि सादगी भरी शादियों को भी उतना ही महत्व दिया जाए और उन्हें समाज में प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
सरकार और सामाजिक संस्थाएँ भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। कई जगहों पर सामूहिक विवाह कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहाँ कम खर्च में कई जोड़ों की शादी करवाई जाती है। इससे गरीब परिवारों को बहुत राहत मिलती है और समाज में सादगी का संदेश भी फैलता है।
अंत में यह समझना जरूरी है कि शादी का असली अर्थ दिखावा नहीं बल्कि दो लोगों का साथ और दो परिवारों का मिलन है। खुशियाँ महंगे कपड़ों, बड़ी सजावट या भव्य कार्यक्रमों से नहीं बल्कि प्यार, विश्वास और संस्कारों से बनती हैं।
इसलिए यदि समाज के बड़े और संपन्न लोग सादगी से शादी करके उदाहरण प्रस्तुत करें, तो यह पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन सकता है। इससे न केवल अनावश्यक खर्च कम होगा बल्कि समाज में संतुलन, जिम्मेदारी और सादगी की भावना भी मजबूत होगी।
वास्तव में एक अच्छी शादी वही है जिसमें खुशी हो, सम्मान हो और परिवारों का स्नेह हो। अगर यह सब सादगी के साथ हो जाए, तो वही सबसे बड़ा उत्सव बन जाता है।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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