– डॉ. प्रियंका सौरभ
ईरानी राज्य मीडिया की आधिकारिक घोषणा ने दुनिया हिला दी—सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई 28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इजरायल के हवाई हमलों में तेहरान में शहीद हो गए। सोशल मीडिया की वह पोस्ट सही साबित हुई—”ख़ामेनेई का जाना एक युग का अंत है। भारत ने अपना एक सच्चा दोस्त खो दिया है।” खामेनेई जी को विनम्र श्रद्धांजलि। उनके नेतृत्व में ईरान ने पाकिस्तान के खिलाफ हमारा साथ दिया, कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में भारत के पक्ष में वोट किया, ऊर्जा क्षेत्र में सुरक्षा प्रदान की और सस्ता तेल उपलब्ध कराया। आज ईरान संकट में डूबा है। भारत को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। वैश्विक तानाशाह अमेरिका को रोकना होगा—वेनेजुएला के बाद ईरान, आगे कौन होगा?
भारत-ईरान संबंध प्राचीन जड़ों वाले हैं। सिंधु घाटी सभ्यता और फारस साम्राज्य के व्यापार से लेकर आज का चाबहार बंदरगाह तक—यह मित्रता इतिहास की गवाह है। 1950 के दशक में गैर-संरेखित आंदोलन ने औपचारिक रूप दिया। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद उतार-चढ़ाव आए, लेकिन 1989 से खामेनेई के नेतृत्व ने स्थिरता लाई। कश्मीर पर उनका रुख अटल रहा। 1971, 1994 और 2017 के संयुक्त राष्ट्र मतदान में ईरान ने पाकिस्तान के प्रचार को नकारा, भारत का साथ दिया। जब अधिकांश मुस्लिम देश पाक के साथ थे, ईरान ने कहा—कश्मीर भारत का आंतरिक मामला। यह कूटनीतिक जीत थी।
पाकिस्तान के खिलाफ ईरान का समर्थन प्रत्यक्ष था। बलूचिस्तान सीमा विवादों में ईरान ने पाक को कड़ा संदेश दिया। अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ भारत को सहयोग मिला। चाबहार बंदरगाह इसका प्रतीक बना। 2016 में प्रधानमंत्री मोदी की पहल से शुरू $500 मिलियन की यह परियोजना पाक के ग्वादर को चुनौती देती है। मध्य एशिया, अफगानिस्तान तक वैकल्पिक मार्ग खोलती है। 2024 तक भारत ने $370 मिलियन निवेश किया। 2025 में इसे भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर से जोड़ा गया। खामेनेई ने इसे व्यक्तिगत रूप से समर्थन दिया। ऊर्जा सहयोग भी ऐतिहासिक। 2005-2015 में ईरान भारत को 25 प्रतिशत क्रूड ऑयल सप्लाई करता था, बाजार से 20 प्रतिशत सस्ता। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद अनौपचारिक रुपया-तेल व्यापार से भारत ने $12 बिलियन बचत की। 2023 में द्विपक्षीय व्यापार $2.5 बिलियन पहुंचा। ईरान ने भारत से चावल, चाय, दवाइयां और इंजीनियरिंग सामान खरीदा। खामेनेई ने कहा था—भारत हमारा सांस्कृतिक भाई है।
ईरान का वर्तमान संकट गहरा है। अमेरिकी प्रतिबंधों से अर्थव्यवस्था ध्वस्त—मुद्रास्फीति 45 प्रतिशत, बेरोजगारी 15 प्रतिशत, GDP 12 प्रतिशत सिकुड़ी। परमाणु समझौता JCPOA (2015) विफल, इजरायल के साइबर हमले और हवाई कार्रवाई बढ़ी। हूती विद्रोहियों को समर्थन से लाल सागर में शिपिंग बाधित, वैश्विक व्यापार को नुकसान। आंतरिक स्तर पर महसा अमिनी आंदोलन (2022) से महिलाओं का गुस्सा भड़का। खामेनेई की शहादत के बाद उत्तराधिकार युद्ध शुरू। विशेषज्ञ परिषद तीन सदस्यीय अस्थायी परिषद बनाएगी। संभावित उत्तराधिकारी—मजलिस स्पीकर मोहम्मद बघर गलिबाफ या IRGC प्रमुख। लेकिन सैन्य तख्तापलट का खतरा। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इसे “न्याय का दिन” कहा। इजरायल ने जश्न मनाया। यह एकतरफा तानाशाही है। वेनेजुएला का तेल संकट, सीरिया का विनाश—अब ईरान। अगला निशाना यमन या उत्तर कोरिया?
भारत ने संतुलित नीति अपनाई। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में ईरान को पूर्ण सदस्यता, क्वाड में अमेरिका से साझेदारी। इजरायल से $2.5 बिलियन रक्षा सौदे—ड्रोन, मिसाइल। लेकिन ईरान को कभी नहीं छोड़ा। 2025 BRICS शिखर में डी-डॉलराइजेशन और ऊर्जा सहयोग पर सहमति। विदेश मंत्रालय ने “क्षेत्रीय स्थिरता” पर नजर रखने की बात कही। चाबहार परियोजना जारी। लेकिन सोशल मीडिया का सवाल जायज—”अमेरिका और इज़रायल की तानाशाही के कुछ तो बोलो मोदी जी, आप विश्वगुरु नहीं गुरुघंटाल हो।” मोदी सरकार की चुप्पी आलोचना का कारण बनी। G20 (2023) में “एक पृथ्वी, एक परिवार” का नारा दिया, लेकिन ईरान संकट पर मौन। अबू धाबी अब्राहम समझौते समर्थित, लेकिन ईरान अलग-थलग। यह संतुलन या कायरता?
भारत को क्या कदम उठाने चाहिए? पहला—चाबहार को प्राथमिकता। $500 मिलियन अतिरिक्त निवेश, अफगानिस्तान तक रेल और सड़कें। दूसरा—नए ईरानी नेतृत्व से तत्काल संपर्क। शोक सभा में उच्च स्तरीय प्रतिनिधि भेजें। तीसरा—ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करें। रूस से 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन जारी, ईरान से 1 मिलियन बहाल। चौथा—बहुपक्षीय मंचों पर सक्रियता। BRICS, SCO से अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध। पांचवां—क्षेत्रीय शांति पहल। ईरान-पाक-अफगानिस्तान त्रिपक्षीय वार्ता की मेजबानी। भारत की कूटनीति परीक्षित—रूस-यूक्रेन युद्ध में तेल खरीदा, लद्दाख में चीन रोका, कतर मध्यस्थ बना। ईरान में भी यही दोहराएं। हरियाणा का महत्व—राज्य की हरित ऊर्जा नीति को ईरान का सस्ता तेल मिले। गुरुग्राम IT निर्यात चाबहार से मध्य एशिया जाए। रोहतक-करनाल के किसान चावल निर्यात दोगुना। भाजपा विधायक नायब सिंह सैनी ने क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया।
निष्कर्ष (लगभग 100 शब्द)
आज का क्षण केवल शोक या प्रतिक्रिया का नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण निर्णय का है। पश्चिम एशिया की अस्थिरता यह सिखाती है कि शक्ति के प्रयोग से विचार दबते नहीं, बल्कि और प्रखर होते हैं। भारत के लिए आवश्यक है कि वह भावनाओं और दबावों से ऊपर उठकर अपने दीर्घकालिक हितों, क्षेत्रीय शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून के पक्ष में स्पष्ट व संतुलित रुख अपनाए। संवाद, बहुपक्षीय सहयोग और ऊर्जा-व्यापार की निरंतरता भारत की रणनीतिक मजबूती हैं। विश्वगुरु बनने का अर्थ तटस्थ चुप्पी नहीं, बल्कि संकट में न्याय, स्थिरता और आत्मसम्मान के साथ नेतृत्व करना है। यही समय की माँग है।
**मोदी जी, अब समय बोलने का है।** खामेनेई की शहादत पर चुप्पी विश्वगुरु की गरिमा को ठेस पहुंचा रही। अमेरिका-इजरायल की तानाशाही खुले शब्दों में नाम लो। “गुरुघंटाल” न कहलाओ—G20 नारे से आगे बढ़ो। राष्ट्रपति ट्रंप को फोन करो, चेतावनी दो—ईरान पर अधिक आक्रमण बर्दाश्त नहीं। इजरायल को संयम बरतने को कहो। संसद में बयान दो, चाबहार बचाओ। BRICS से डी-डॉलराइजेशन तेज करो। हरियाणा से लेकर कन्याकुमारी तक भारत ईरान का साथ चाहता। आपने राम मंदिर बनवाया, अयोध्या को जीवंत किया—अब कूटनीति में भी इतिहास रचो। विश्वगुरु बनना नारों से नहीं, साहस से होता। खामेनेई अमर रहें। उनकी शहादत मोदी जी के कंधों पर जिम्मेदारी डाल गई। बोलो, कदम उठाओ—भारत इंतजार कर रहा!

By Dr. Rajesh Wadhwa

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