(मेरिट के नाम पर चयन या चयन के नाम पर मेरिट की हत्या?)
इतिहास में यह शायद पहली बार है कि किसी चयन परीक्षा का उत्तीर्ण मानदंड और मेरिट, परिणाम देखने के बाद तय किए जाने की स्थिति में रखे गए हों। हरियाणा सरकार की राजकीय मॉडल संस्कृति एवं पीएम श्री विद्यालय शिक्षक तैनाती नीति–2025 को काग़ज़ों में पारदर्शिता और निष्पक्षता का दस्तावेज़ बताया जा रहा है, लेकिन इसके प्रावधानों का गहन अध्ययन कई गंभीर और असहज प्रश्न खड़े करता है।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
पीएम श्री विद्यालय शिक्षक तैनाती नीति की सबसे बड़ी और बुनियादी कमी यह है कि स्क्रीनिंग परीक्षा के लिए न्यूनतम उत्तीर्ण अंक निर्धारित ही नहीं किए गए हैं। जब यह स्पष्ट नहीं है कि परीक्षा में पास होने के लिए कितने अंक आवश्यक होंगे, तो चयन को योग्यता आधारित कैसे कहा जा सकता है? यह कोई साधारण तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सीधा आघात है। नीति के अनुसार स्क्रीनिंग परीक्षा को कुल चयन में साठ प्रतिशत वज़न दिया गया है, लेकिन पास–फेल का कोई स्पष्ट मानक न होने के कारण यह परीक्षा पूरी तरह प्रशासनिक विवेक पर निर्भर हो जाती है।
जब विवेक के लिए कोई लिखित, सार्वजनिक और बाध्यकारी मानक नहीं होते, तो चयन प्रक्रिया स्वतः ही संदेह के घेरे में आ जाती है। यहीं से बैकडोर एंट्री की संभावना जन्म लेती है—जिसे चाहें उत्तीर्ण और जिसे चाहें बाहर।
इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि नीति में अनिवार्य मेरिट सूची बनाने का कोई प्रावधान नहीं है। न रैंकिंग का उल्लेख है, न कट-ऑफ अंकों का और न ही यह स्पष्ट किया गया है कि समान अंक होने की स्थिति में प्राथमिकता कैसे तय होगी। इससे पहले जब केंद्रीय स्तर पर आयोजित परीक्षाओं के माध्यम से चयन हुआ था, तब स्पष्ट मेरिट सूची, सार्वजनिक प्राप्तांक और तुलनात्मक मूल्यांकन की व्यवस्था मौजूद थी।
वर्तमान नीति में चयन प्रक्रिया चुनौती योग्य न होकर, केवल औपचारिक वैधता का साधन बनती प्रतीत होती है—मानो निर्णय पहले हो चुके हों और अंक बाद में उन्हें सही ठहराने के लिए जोड़े गए हों। स्क्रीनिंग परीक्षा की पारदर्शिता स्वयं एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। यह स्पष्ट नहीं किया गया कि प्रश्नपत्र कौन तैयार करेगा, मूल्यांकन किस संस्था या एजेंसी द्वारा और किस पद्धति से किया जाएगा, तथा अंकों के सामान्यीकरण जैसी कोई व्यवस्था होगी या नहीं। जब चयन का सबसे बड़ा भाग इसी परीक्षा पर आधारित हो और वही सबसे अधिक अस्पष्ट हो, तो यह आशंका स्वाभाविक है कि योग्यता से अधिक पहचान, पहुँच और सिफारिश निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
नीति के पीछे की पृष्ठभूमि पर नज़र डालें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। वास्तविकता यह है कि इन पीएम श्री एवं मॉडल संस्कृति विद्यालयों के लिए अपेक्षित संख्या में आवेदन ही नहीं आए। विभाग स्वयं जानता है कि जिस स्क्रीनिंग परीक्षा का आयोजन किया गया, उसमें सभी अभ्यर्थी निर्धारित स्तर पर उत्तीर्ण नहीं हो पाए। यही कारण रहा कि शुरुआती चरणों में ही इन विद्यालयों में अनेक पद रिक्त रह गए। रिक्त पद विभागीय साख के लिए असहज स्थिति पैदा करते हैं। “मॉडल” विद्यालयों में खाली पद शिक्षा व्यवस्था की सफलता के दावों को कमजोर करते हैं।
इसी दबाव में विभाग ने प्रारंभिक चरणों में चयन प्रक्रिया के मापदंडों में शिथिलता बरती। दूर-दराज़ जिलों में कार्यरत शिक्षकों को उचित मापदंड, साक्षात्कार और मेरिट की कठोरता में ढील देकर इन विद्यालयों में समायोजित किया गया। इस प्रक्रिया से अनेक ऐसे शिक्षकों को, जो वर्षों से दूरस्थ क्षेत्रों में तैनात थे, अपने गृह या समीपवर्ती जिलों में आने का अवसर मिल गया। बाद के चरणों में स्थिति और असंगत हो गई। जो अभ्यर्थी बाद में आए, वे उन मापदंडों से अलग थे जो प्रारंभ में इन विद्यालयों के लिए निर्धारित किए गए थे। चयन प्रक्रिया में यह असमानता स्वयं इस बात का प्रमाण है कि नीति का क्रियान्वयन न तो एकरूप रहा और न ही निष्पक्ष।
इसी पृष्ठभूमि में वर्तमान नीति में न्यूनतम उत्तीर्ण अंक न रखना, परिणाम और मेरिट सूची को सार्वजनिक न करना किसी भूल का परिणाम नहीं लगता। विभाग को यह भय स्पष्ट रूप से है कि यदि कठोर मापदंड, स्पष्ट कट-ऑफ और पारदर्शी मेरिट लागू की गई, तो बड़ी संख्या में सीटें खाली रह जाएँगी। वास्तविकता यह भी है कि अधिकांश शिक्षक इन विद्यालयों में जाना नहीं चाहते—न कार्य परिस्थितियाँ आकर्षक हैं और न ही स्थानांतरण नीति में कोई दीर्घकालिक सुरक्षा। यही कारण है कि पूरी प्रक्रिया को जानबूझकर लचीला, अस्पष्ट और प्रशासनिक विवेक पर आधारित रखा गया है।
यदि सीटें खाली रह जाती हैं, तो बिना मेरिट, बिना तुलनात्मक मूल्यांकन और बिना सार्वजनिक जवाबदेही के किसी को भी—विशेषकर “अपने लोगों” को—इन विद्यालयों में भेजा जा सके। यहीं पर योग्यता आधारित चयन की अवधारणा समाप्त होती है और नियंत्रित चयन की व्यवस्था शुरू होती है। नीति का एक और गंभीर पहलू यह है कि चयन के बाद शिक्षक दस वर्षों तक इन्हीं विद्यालयों में बने रह सकते हैं। यदि चयन प्रक्रिया ही त्रुटिपूर्ण या पक्षपातपूर्ण हुई, तो उस गलती को सुधारने की कोई व्यावहारिक संभावना शेष नहीं रहती। इसका नुकसान केवल योग्य शिक्षकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विद्यार्थियों और पूरी शिक्षा व्यवस्था को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।
यदि सरकार की मंशा वास्तव में निष्पक्ष और गुणवत्तापूर्ण चयन की होती, तो पदों की संख्या के अनुपात में तीन या पाँच गुना अभ्यर्थियों की स्पष्ट मेरिट सूची तैयार की जा सकती थी। यह प्रक्रिया संवैधानिक, न्यायसंगत और कानूनी दृष्टि से कहीं अधिक मजबूत होती, लेकिन नीति में इस विकल्प को जानबूझकर शामिल नहीं किया गया। अक्सर किसी नीति की असली मंशा उसमें लिखी बातों से नहीं, बल्कि उन बातों से समझ में आती है जो उसमें नहीं लिखी होतीं। न्यूनतम उत्तीर्ण अंकों का अभाव, मेरिट सूची की अनिवार्यता न होना और चयन प्रक्रिया को चुनौती देने के स्पष्ट प्रावधानों का न होना—ये सभी संकेत देते हैं कि उद्देश्य योग्यता आधारित चयन नहीं, बल्कि सीटें भरने और चयन को नियंत्रित करने का है।
अंततः यह नीति मेरिट आधारित चयन की अपेक्षा मेरिट के नाम पर बैकडोर एंट्री की अधिक प्रतीत होती है। यदि सरकार वास्तव में शिक्षा की गुणवत्ता और निष्पक्षता को लेकर गंभीर है, तो उसे न्यूनतम उत्तीर्ण अंक स्पष्ट रूप से निर्धारित करने होंगे, मेरिट सूची को अनिवार्य बनाना होगा और पूरी चयन प्रक्रिया को सार्वजनिक निगरानी के दायरे में लाना होगा। अन्यथा यह नीति भविष्य में चयन नहीं, बल्कि चयन के नाम पर मेरिट की हत्या के उदाहरण के रूप में याद की जाएगी।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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