गीता ज्ञान संस्थानम् में विश्व ध्यान दिवस पर लिया गया आंतरिक शक्ति, सकारात्मक ऊर्जा और वैश्विक सद्भाव का संकल्प

सोनिका वधवा

कुरुक्षेत्र।  परम पूज्य गीता मनीषी स्वामी श्री ज्ञानानंद जी महाराज के सानिध्य में गीता ज्ञान संस्थानम् कुरुक्षेत्र के ध्यान कक्ष में विश्व ध्यान दिवस पर सामूहिक ध्यान साधना का आयोजन किया गया जिसमें स्वामी जी ने ध्यान का अभ्यास करवाया। इस दौरान सामूहिक ध्यान के माध्यम से आंतरिक शक्ति, सकारात्मक ऊर्जा और वैश्विक सद्भाव का संकल्प दिलाया गया। इस ध्यान साधना सत्र का थीम ‘गीता संग जीने का ढंग बनाएं, ध्यान को जीवन का अंग बनाएं’ रखा गया, क्योंकि आज के तनावपूर्ण और भाग दौड़ भरे जीवन में ध्यान ही वह साधन है जो मन, बुद्धि और आत्मा के बीच समन्वय बनाता है।
अपने आशीर्वचनों में स्वामी श्री ज्ञानानंद जी महाराज ने कहा कि इच्छाशक्ति को सशक्त करने के लिए विश्व में ध्यान का कोई विकल्प नहीं है। ध्यान केवल एक साधना नहीं है, अपितु स्वस्थ और सार्थक जीवन की कुंजी है। निरंतर अभ्यास करने से मन एकाग्र होता है और एकाग्र मन वाला व्यक्ति जीवन में निश्चित रूप से सफलता प्राप्त करता है। ध्यान की शक्ति बताते हुए स्वामी जी ने कहा कि जो विद्यार्थी ध्यान का अभ्यास करते हैं, उनका मन एकाग्र रहता है तथा वे पढ़ाई में हमेशा अग्रणी रहते हैं।
स्वामी जी ने कहा कि यूनेस्को ने जब अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया तो भारत की यह विधा विश्व के लिए योग के रूप में प्रयोग बन गई, इसी प्रकार ध्यान की उपयोगिता को देखते हुए और इसके तत्व, महत्व एवं सत्व को समझते हुए विश्व ध्यान दिवस के रूप में 21 दिसम्बर का दिन निर्धारित हुए। उन्होंने कहा कि ध्यान केवल सही आसन नहीं है, यद्यपि सही आसन ध्यान के लिए आवश्यक है। पतंजलि योग दर्शन में योग के अष्ट रूप बताए गए हैं, उनमें ध्यान को तीसरे क्रम में लिया गया है। ध्यान जाति, धर्म, वर्ग, रंगभेद, लिंगभेद समेत तमाम प्रकार के भेदभाव से ऊपर उठकर हर व्यक्ति की आवश्यकता है। विचारों को शक्ति का रूप देने के लिए और मन को आशंकाओं, दुविधाओं एवं चिंताओं के भंवर जाल में न उलझाए रखकर मानसिक शक्ति का रूप देने के लिए ध्यान एक सशक्त साधन है।
स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने कहा कि गीता के छठे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने यह बात कही कि मन शत्रु भी बन सकता है और मित्र भी बन सकता है, मन उत्थान भी कर सकता है और पतन की ओर भी ले जा सकता है। इस अध्याय का नाम आत्म संयम योग भी है और कुछ गीता स्कॉलर्स ने इसे ध्यान योग का नाम भी दिया है, जिसमें ऐसा भाव दिया गया है कि मन को शत्रु नहीं बनने दो, बल्कि अपना मित्र बनाओ। गीता में ध्यान का पूरा एक क्रमिक वर्णन है, बिल्कुल एक वैचारिक क्रम है, जिसमें विभिन्न श्लोकों के माध्यम से बताया गया है कि शरीर की स्थिति क्या हो, मन की स्थिति क्या हो, ध्यान का महत्व क्या है, ध्यान का स्वरूप क्या है?
इस अवसर पर हरियाणा के ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज ने कहा कि ध्यान हमें ‘मैं’ से अलग करता है और यदि ईश्वर को प्राप्त करना है तो इस ‘मैं’ को छोडऩा पड़ेगा। उन्होंने ध्यान की महिमा का वर्णन करते हुए सभी को ध्यान का निरंतर अभ्यास करने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम के दौरान कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा, श्रीकृष्ण आयूष विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. करतार सिंह, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के निदेशक प्रो. वी. रमन रेड्डी ने भी अपने वक्तव्यों में ध्यान की महिमा पर व्याख्यान दिया और ध्यान को जीवन का अंग बनाने पर जोर दिया। कार्यक्रम में राष्ट्रीय पंजाबी महासभा के नेशनल प्रेसिडेंट एवं हरियाणा के पूर्व सूचना आयुक्त अशोक मेहता विशेष तौर पर शामिल हुए। इसके अलावा विभिन्न शिक्षण संस्थानों के शिक्षक, गैर शिक्षण स्टाफ, विद्यार्थी, व्यापारी वर्ग तथा महिलाओं सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने ध्यान शिविर में भाग लिया।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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