नेत्र और देह का दान कर अमर हो गए कुरुक्षेत्र के किशन…
किशन लाल सचदेवा का हुआ निधन, मरणोपरांत किया नेत्रदान और देहदान
डॉ. राजेश वधवा
कुरुक्षेत्र। जी हां कुरुक्षेत्र के ज्योति नगर निवासी किशन लाल सचदेवा मरणोपरांत अपनी आंखों और शरीर का दान करके सचमुच अमर हो गए।
आज उनके आकस्मिक निधन के उपरांत उनके परिजनों ने उनकी इच्छा के अनुरूप पीजीआई चंडीगढ़ को उनका शरीर मरणोपरांत दान दिया गया और अर्पण नेत्र बैंक को उनकी आँखें मरणोपरांत दान दी गई ताकि उनकी मौत के बाद वे दूसरों के काम आए।
स्वर्गीय किशन लाल सचदेवा के सुपुत्र धर्मेंद्र सचदेवा जोकि जन सेवा दल के प्रधान होने के साथ साथ माधव नेत्र बैंक और अर्पण नेत्र बैंक के सदस्य भी हैं, उन्होंने बताया कि उनके पिता ने मरणोपरांत नेत्रदान और देहदान करने का संकल्प लिया हुआ था और इसी ईच्छानुसार परिवार के सदस्यों ने उनके मरणोपरांत मृत शरीर और नेत्रों का दान कर दिया। पीजीआई चंडीगढ़ में उनका पार्थिव शरीर भेजा गया है। अर्पण नेत्र बैंक को मरणोपरांत उनकी आँखें दान की गई हैं। प्राचीन मुल्तान सभा के प्रधान प्रदीप झांब, व्यापार मंडल के प्रधान फतेहचंद गांधी ने सचदेवा परिवार के इस कार्य को पूरे समाज के लिए प्रेरणादायक बताया है। प्रदीप झांब और फतेहचंद गांधी ने कहा कि पूरे समाज को किशन लाल सचदेवा के इस कार्य से प्रेरणा लेनी चाहिए और ज्यादा से ज्यादा देहदान, अंगदान व नेत्रदान का संकल्प लेना चाहिए।
आपको बता दें कि स्वर्गीय किशन लाल सचदेवा का भरा पूरा परिवार है। पूरा परिवार सामाजिक है। समाज के कार्यों में बढ चढ कर भाग लेता है।
उनके पुत्र धर्मेंद्र सचदेवा, पौत्र राघव, पुत्री चंचल रानी, पूनम सलूजा, दामाद चमन लाल गुलाटी, भारत भूषण आदि ने बताया कि कई साल पहले किशन लाल सचदेवा जी ने मरणोपरांत अपने शरीर और नेत्रों का दान करने का संकल्प लिया हुआ था। आज उनकी मौत के बाद उनकी इच्छानुसार परिवार के सदस्यों ने मृत शरीर और नेत्रों को दान करने का निर्णय लिया।  उनके पार्थिव शरीर को शहर के असंख्य गणमान्य लोगों ने नम आंखों से अंतिम विदाई दी।
काबिलेजिक्र है कि बिना अंतिम संस्कार के इस प्रकार की विदाई करना परिवार के लिए आसान नही था लेकिन पूरे परिवार ने हिम्मत जुटाई और भरे मन से आंखों में आंसू लिए परिवार के सदस्यों ने पार्थिव शरीर को अंतिम विदाई दी।  किशन लाल सचदेवा आज मर कर भी अमर हो गए हैं। उनके इस कार्य की चहुंओर प्रशंसा हो रही है। श्याम आहूजा, ओपी धमीजा, अमित गुलाटी, सतीश ललित, जगदीश सचदेवा, प्रेम मदान, राजेश वेद, केवल कृष्ण छाबड़ा, जगदीश सचदेवा, दीपक सचदेवा, किशन लाल, राकेश ढल, विवेक भारद्वाज, लाभ सिंह सहगल, बिट्टू झांब, परिवार के इस कार्य को पूरे समाज के लिए प्रेरणादायक बताया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पूरे समाज को किशन लाल के इस कार्य से प्रेरणा लेनी चाहिए और ज्यादा से ज्यादा देहदान, अंगदान व नेत्रदान का संकल्प लेना चाहिए। लोगों का कहना है कि मरने के बाद शरीर किसी जरूरतमंद के काम आए इससे बड़ा पुण्य का काम क्या हो सकता है।
प्रदीप झांब का कहना है कि हमारे देश में देहदान कम ही किया जाता है लेकिन यह समय की जरूरत है और हम सबको ज्यादा से ज्यादा देहदान, अंगदान व नेत्रदान का संकल्प जरूर लेना चाहिए
वरिष्ठ पत्रकार सौरभ चौधरी का कहना है कि हमारे देश में प्राचीन काल से देह का दान होता आया है। प्राचीन काल में महर्षि दधीचि ने देवताओं के कल्याण के लिए न केवल अपनी देह का त्याग किया था बल्कि मृत्यु के बाद देवताओं ने उनकी अस्थियों से वज्र बनाया जिससे वे असुरों का संहार कर सके। हमारे देश के र्शीष नेताओं द्वारा भी मरणोपरांत देहदान के उदाहरण सामने आए हैं। बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु, पूर्व लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी, जनसंघ के नानाजी देशमुख, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश लीला सेठ, विहिप नेता आचार्य गिरिराज किशोर इत्यादि के मरने के बाद उनकी इच्छानुसार देह मेडिकल कॉलेजों को सौंपी गई। उन्होंने कहा कि अब आमजन को भी देहदान, अंगदान व नेत्रदान के प्रति जागरूक होना जरूरी है।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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