कार्तिकेय की पूजा से शांत होते हैं क्रूर ग्रह, कार्तिक पूर्णिमा 15 नवंबर शुक्रवार को दुर्लभ योग में पड़ रही जिसका विशेष महत्व माना जाता है।
कुरुक्षेत्र, 14 नवम्बर :  महाभारत एवं पुराणों में कुरुक्षेत्र के प्राचीन तीर्थों व मंदिरों का गूढ़ रहस्य छिपा है। उसी में से एक कुरुक्षेत्र से करीब 25 किलोमीटर दूर पृथुदक तीर्थ ( पिहोवा ) में प्राचीन कार्तिकेय मन्दिर है। इस मन्दिर की धार्मिक महत्ता के कारण सैकड़ों लोग प्रतिदिन पूजा – अर्चना के लिए पिहोवा जाते हैं।
इस मन्दिर में कार्तिकेय जी का सरसों के तेल से अभिषेक किया जाता है और सिंदूर से कार्तिकेय जी का तिलक किया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा व्रत 15 नवंबर दिन शुक्रवार को है। इस दिन कार्तिकेय का तेल साथ में सिंदूर से अभिषेक करने पर एक वर्ष तक अभिषेक करने का फल प्राप्त हो जाता है और जन्मकुंडली के सभी क्रूर ग्रह भी शांत हो जाते हैं। जन्मकुंडली में विभिन्न दोषों जैसे पितृ दोष, गृहस्थ सुख में अड़चनें, कारोबार में बाधाएं, धन का अपव्यय, संतान पुत्र सुख की कमी, असाध्य रोग और शत्रु पीड़ा आदि के कुप्रभाव भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन कार्तिकेय जी का सरसो के तेल का अभिषेक सिंदूर सहित करने से दूर हो जाते हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जब भगवान शंकर अपने पुत्र कार्तिकेय को राजतिलक करने का विचार करने लगे तब माता पार्वती अपने छोटे पुत्र गणेश को राजतिलक करवाने के लिए हठ करने लगी। तभी ब्रह्मा, विष्णु व शंकर जी सहित सभी देवी-देवता एकत्रित हुए और सभा में यह निर्णय लिया गया कि दोनों भाइयों में से समस्त पृथ्वी का चक्कर लगाकर जो पहले यहां पहुंचेगा, वही राजतिलक का अधिकारी होगा।
भगवान कार्तिकेय अपने प्रिय वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए चल पड़े। जब गणेण जी अपने वाहन मूषक पर बैठकर चक्कर लगाने के लिए जाने लगे तभी माता पार्वती गणेश जी को कहने लगी कि वत्स, तुम यहीं पर इकट्ठा हुए समस्त देवगणों की परिक्रमा कर डालो क्योंकि त्रिलोकीनाथ यहीं विद्यमान हैं। माता पार्वती के ऐसा समझाने पर गणेश जी ने तीन चक्कर लगाकर भगवान शंकर को प्रणाम किया और कहा कि उन्होंने संपूर्ण जगत की परिक्रमा कर ली है। तब भगवान शंकर विस्मित हुए और उन समेत सभी ने गणेश जी को राजतिलक कर दिया। तब उन्हें शुभ-अशुभ कार्यों में प्रथम पूजा का अधिकार दे दिया गया। उन्होंने बताया कि उधर मार्ग में नारद जी ने कार्तिकेय को सारा वृत्तांत कह डाला। कार्तिकेय अतिशीघ्र परिक्रमा पूरी कर सभा स्थल पर आ पहुंचे और माता पार्वती से सारा हाल जानकर बोले कि उन्होंने उनके साथ छल किया है। तुम्हारे दूध से मेरी खाल व मांस बना हुआ है। मैं इसको अभी उतार देता हूं। अत्यंत क्रोधित होकर कार्तिकेय ने अपनी खाल व मांस उतारकर माता के चरणों में रख दिया और समस्त नारी जाति को श्राप दिया कि मेरे इस स्वरूप के जो स्त्री दर्शन करेगी, वह सात जन्म तक बांझ रहेगी। तभी देवताओं ने उनके शारीरिक शांति के लिए तेल व सिंदूर का अभिषेक कराया, जिससे उनका क्रोध शांत हुआ और भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने कार्तिकेय को समस्त देव सेना का सेनापति बना दिया। तब भगवान कार्तिकेय पृथुदक पिहोवा में सरस्वती तट पर पिंडी के रूप में स्थित हुए और उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति मेरे शरीर पर तेल का अभिषेक कराएगा, उसके मृत्यु को प्राप्त हो गए पितर आदि बैकुंठ में प्रतिष्ठित होकर मोक्ष के अधिकारी होंगे। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर व्रत व अभिषेक करने से कई जन्मों के किए पाप नष्ट हो जाते हैं और सृख एवं समृद्धि के साथ-साथ सौभाग्य आदि सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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