जाति नहीं, ज्ञान और कर्म से होती है व्यक्ति की पहचानः प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
केयू में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
कुरुक्षेत्र, 10 सितंबर। 
गुरु रविदास जी की वाणी समता, मानवता और सामाजिक न्याय का मार्ग दिखाती है। गुरु रविदास जी महाराज की शिक्षाएं किसी एक जाति, वर्ग, संप्रदाय अथवा देश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उन्होंने ऐसे समय में समाज को ज्ञान, भक्ति, प्रेम, समानता और सामाजिक न्याय का मार्ग दिखाया, जब जातिगत भेदभाव, छुआछूत और सामाजिक कुरीतियां गहराई तक व्याप्त थीं। यह विचार डेरा सिरसागढ़ के मुख संचालक संत मंदीप दास ने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में संत शिरोमणि गुरु रविदास चेयर द्वारा वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य में संत शिरोमणि गुरु रविदास जी के दर्शन एवं शिक्षाओं की प्रासंगिकता विषय पर गुरुवार को सीनेट हॉल में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में व्यक्त किए। इससे पहले दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर अतिथियों द्वारा डॉ. परवेश द्वारा डॉ. अंबेडकर पर लिखित पुस्तक का विमोचन भी किया गया।
डॉ. गुरु रविदास चेयर के सह-संयोजक व डॉ. अम्बेडकर केन्द्र के निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह ने सभी अतिथियों का स्वाागत करते हुए कहा कि श्रेष्ठ एवं समाज का मार्गदर्शन करने वाले लोग जैसा आचरण करते हैं, आने वाली पीढ़ियाँ भी उसी से प्रेरणा लेती हैं। गुरु रविदास जी पंद्रहवीं शताब्दी के महान संत, कवि और समाज सुधारक थे। उन्होंने जातिभेद, पाखंड और सामाजिक विषमता का विरोध करते हुए समानता, मानवता और सामाजिक समरसता का संदेश दिया। उनका स्पष्ट मानना था कि मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म और गुणों से होती है।
संत मंदीप दास ने कहा कि भारतीय संत परंपरा ने सदियों से समाज को अज्ञानता, रूढ़ियों और भेदभाव से बाहर निकालने का कार्य किया है। गुरु रविदास जी ऐसे दौर में सामने आए जब मनुष्य-मनुष्य के बीच जाति के आधार पर इतना भेदभाव था कि एक वर्ग के लोगों की परछाई तक से लोग दूरी बनाते थे। उन्होंने गुरु रविदास जी के ‘बेगमपुरा’ के विचार को सामाजिक समानता का आदर्श बताते हुए कहा कि उन्होंने ऐसे नगर की कल्पना की, जहां किसी प्रकार का दुख, चिंता, भय, भेदभाव या सामाजिक बंधन न हो। आज तनाव और चिंता से जूझ रहे समाज के लिए भी यह विचार अत्यंत प्रासंगिक है। गुरु रविदास जी का संदेश मनुष्य को बाहरी आडंबरों के बजाय अपने भीतर परमात्मा को खोजने की प्रेरणा देता है। मधुमक्खियों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि गुरु रविदास जी ने समाज को एकता, अनुशासन और प्रेम की शक्ति समझाई। मधुमक्खियां फूलों से रस एकत्र करके सामूहिक रूप से छत्ता बनाती हैं और एक-दूसरे के साथ मिलकर रहती हैं। आवश्यकता पड़ने पर वे अपने समूह की रक्षा भी करती हैं। इसी प्रकार यदि समाज प्रेम, अनुशासन और संगठन के साथ एकजुट हो जाए तो कोई भी शक्ति उसे कमजोर नहीं कर सकती।
साहित्य अकादमी, पंचकूला के उपाध्यक्ष प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने मुख्य वक्ता के रूप में कहा कि  व्यक्ति की पहचान जाति नहीं, ज्ञान और कर्म से होती है । गुरु रविदास जी की वाणी और दर्शन 650 वर्ष बाद भी सामाजिक समानता, समरसता और मानवता के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं। महान संतों की शिक्षाएं किसी एक काल तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि उनके शाश्वत मूल्य सदैव समाज का मार्गदर्शन करते हैं। उन्होंने कबीर के दोहे का उदाहरण देते हुए कहा कि व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी जाति या बाहरी पहचान से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान, कर्म, योग्यता और आचरण से होना चाहिए। गुरु रविदास जी ने भी ज्ञान की साधना को सर्वोच्च महत्व दिया और अपनी वाणी के माध्यम से सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठने का संदेश दिया। प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने कहा कि गुरु रविदास जी को समझने के लिए उनकी वाणी को मूल रूप से पढ़ना आवश्यक है। आज भी समाज में मौजूद अनेक समस्याओं के समाधान के लिए उनकी शिक्षाओं पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि गुरु रविदास जी का संदेश किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए है और ज्ञान, समानता, भक्ति तथा सामाजिक समरसता का मार्ग दिखाता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. (डॉ.) वीरेंद्र पाल ने कहा कि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की समृद्ध परंपरा रही है, लेकिन पिछले 12-14 वर्षों में इस स्तर का कार्यक्रम देखने को नहीं मिला। प्रो. वीरेंद्र पाल ने कहा कि संत रविदास, संत कबीर और डॉ. अंबेडकर जैसे महापुरुषों के विचार समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचने चाहिए। इन विचारों के व्यापक प्रसार से सामाजिक परिवर्तन को गति मिलेगी। उन्होंने कहा कि समाज की एक बड़ी समस्या यह है कि हम अपने महापुरुषों के मूल साहित्य का पर्याप्त अध्ययन नहीं करते और दूसरों द्वारा की गई व्याख्याओं को ही सत्य मान लेते हैं। इसलिए विश्वविद्यालय का प्रयास है कि महापुरुषों के मूल विचारों को अध्ययन एवं शोध के माध्यम से समाज तक पहुंचाया जाए। उन्होंने बताया कि कुवि कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कार्यक्रम में उपस्थित होना था, लेकिन प्रशासनिक बैठक के कारण वे इसमें शामिल नहीं हो सके। कुलगुरु ने कार्यक्रम के लिए अपनी शुभकामनाएं और संदेश भेजा। उनका कार्यक्रम को स्मरण करना और शुभकामनाएं देना सभी के लिए उत्साहवर्धक है।
सम्मानित अतिथि के रूप में प्रो. रमेश धारीवाल, राजकीय महाविद्यालय बिलासपुर ने कहा कि भारत का निर्माण किसी एक राजा या योद्धा ने नहीं, बल्कि ऋषियों, मुनियों, संतों, महात्माओं और गुरुओं की ज्ञान परंपरा ने किया है। महर्षि वेदव्यास, महर्षि वाल्मीकि, संत रविदास, संत नामदेव, दादू दयाल, ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु और बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे महापुरुषों ने भारतीय संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति जड़ और रूढ़ नहीं, बल्कि समय के साथ स्वयं को परिष्कृत और अद्यतन करने वाली जीवंत परंपरा है। जब-जब समाज में कुरीतियां, अत्याचार, अन्याय और अव्यवस्था बढ़ी, तब-तब किसी न किसी महापुरुष ने आगे आकर समाज को नई दिशा दी। इसी क्रम में संत रविदास ने सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाकर समानता, समरसता और आत्मसम्मान का संदेश दिया।
प्रो. हरेंद्र सिंह असवाल, दिल्ली विश्वविद्यालय ने कहा भारतीय संत परंपरा ज्ञान, मानवता और सामाजिक चेतना की निरंतर धारा है। श्रीकृष्ण ने गीता में भक्ति, ज्ञान और कर्म का संदेश देते हुए श्रद्धा को ज्ञान प्राप्ति का आधार बताया। उन्होंने कहा कि बुद्ध, कबीर, संत रैदास, गुरु नानक, ज्योतिबा फुले और डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे महापुरुषों ने सामाजिक भेदभाव और कुरीतियों के विरुद्ध जनचेतना जगाई। संत रैदास ने अपने समय के विभिन्न मतभेदों के बीच समता, एकता, सदाचार और मानवता का मार्ग दिखाया। उनकी वाणी अज्ञान को दूर कर ज्ञान और निर्मलता की ओर बढ़ने का संदेश देती है। संत रैदास का चिंतन आज भी प्रासंगिक है और उनकी शिक्षाएँ आने वाली पीढ़ियों को मानवता, समानता तथा सामाजिक न्याय के लिए प्रेरित करती रहेंगी।
हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. महासिंह पूनिया ने कहा कि भारतीय संत परंपरा सनातन संस्कृति की आत्मा है, जिसमें कबीर, तुलसीदास, संत रविदास और संत गरीबदास जैसे महान संतों ने समाज को नई दिशा दी। संत रविदास जी की शिक्षाएँ लगभग 650 वर्ष बाद भी उतनी ही नहीं, बल्कि आज के समय में और अधिक प्रासंगिक हैं।  उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में संत रविदास जी के विचार राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। युवा पीढ़ी को उनके जीवन-दर्शन और शिक्षाओं को आत्मसात करना चाहिए। संत रविदास की वाणी और संदेशों को सोशल मीडिया जैसे आधुनिक माध्यमों से युवाओं तक पहुँचाने की आवश्यकता है, ताकि उनकी शिक्षाओं के आधार पर आदर्श एवं समरस समाज के निर्माण की दिशा में कार्य किया जा सके।  मंच का संचालन उपासना ने किया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. हरिओम फुलिया ने किया।
इस अवसर पर डॉ. प्रीतम सिंह, प्रो. लहरी सिंह, रामकरण, शेर सिंह बांगड, मीहा सिंह, सूरज बेदी, कृष्ण चंद रंगा, बी.आर सिरोही, जसपाल मेहरा, जनरैल रंगा, श्री कृष्ण कुमार, राकेश भोसले, रामकुमार, धर्मपाल पूनिया, राजकपूर अहलावत, प्रो. सुरेश, प्रो. सुभाष चंद, डॉ. धर्मबीर, प्रो. आरके मोदगिल, प्रो. कृष्णा, प्रो. रीटा, प्रो. कुसुमलता, प्रो. परमेश कुमार, प्रो. दीपक राय बब्बर, डॉ. हरिओम फुलिया, डॉ. रमेश सिरोही, डॉ. परवेश, डॉ. जे.के. चंदेल, डॉ. भंवर, दिविज गुगनानी, डॉ. तेलूराम, कुटा प्रधान डॉ. जितेंद्र खटकड़, डॉ. सिम्मी धीर, रचिता सहित सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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डॉ. अम्बेडकर केन्द्र में शुरू होगा आनर्स इन अंबेडकर स्टडीज

कुलसचिव प्रो. वीरेन्द्र पाल ने कहा कि विश्वविद्यालय के डॉ. भीमराव अंबेडकर अध्ययन केंद्र के माध्यम से डॉ. आंबेडकर के विचारों और चिंतन को विद्यार्थियों तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय ने बी.ए. स्तर पर डॉ. अंबेडकर स्टडीज से संबंधित पाठ्यक्रम प्रारंभ किया है। प्रारंभिक स्तर पर सीमित सीटों के साथ इसकी शुरुआत की गई है तथा भविष्य में विद्यार्थियों की रुचि और आवश्यकता के अनुसार सीटों की संख्या बढ़ाई जाएगी।  आगामी सत्र से आनर्स इन डॉ. अंबेडकर स्टडीज को माइनर कोर्स के रूप में भी शुरू करने की योजना है।
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समाज सेवियों को किया सम्मानित

संगोष्ठी के दौरान सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े समाजसेवियों एवं गणमान्य व्यक्तियों को सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वालों में स्टेट फेडरेशन श्री गुरु रविदास एवं डॉ. बी.आर. अंबेडकर सभाएं, हरियाणा, पंचकूला के चेयरमैन श्री राज कपूर अहलावत एवं सेक्रेटरी जनरल तथा उच्च शिक्षा विभाग, हरियाणा के सेवानिवृत्त उप निदेशक श्री डी.पी. पुनिया, श्री गुरु रविदास सभा, सेक्टर-15 पंचकूला के अध्यक्ष श्री कृष्ण कुमार, अंबेडकर सभा सेक्टर-12ए पंचकूला से श्री बी.आर. सरोहा, हरियाणा सरकार की गुरु रविदास स्मारक समिति के सदस्य एवं पीडब्ल्यूडी, हरियाणा के सेवानिवृत्त एसई डॉ. जसपाल मेहरा, वरिष्ठ पत्रकार श्री बाबूराम तुषार एवं श्री जरनैल रंगा, हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सेवानिवृत्त क्षेत्रीय अधिकारी श्री राकेश कुमार भोसले, डॉ. बी.आर. अंबेडकर वेलफेयर कमेटी, कुरुक्षेत्र के कोषाध्यक्ष श्री रामकुमार खरकाली, सीजीआरएफ के चेयरमैन श्री योगराज, गुरु रविदास सभा एवं मंदिर, करनाल के अध्यक्ष श्री के.सी. रंगा, सेवानिवृत्त प्राचार्य श्री रामपाल सरोहा एवं श्री रामकरण, सेवानिवृत्त सेना अधिकारी एवं बीएसएफ से श्री शेर सिंह, महात्मा ज्योतिबा फूले शिक्षा विकास समिति के अध्यक्ष श्री मिहा सिंह रंगा, बाबा सवारनाथ चौरिटेबल समिति के अध्यक्ष श्री मान सिंह बजगाँवा, जोगी समाज से श्री शिवदयाल जंगम तथा पूर्व विधायक श्री लहरी सिंह शामिल रहे।
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65 से अधिक शोध पत्र हुए प्राप्त
अम्बेडकर केन्द्र के निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह ने बताया कि संगोष्ठी के प्रति शिक्षाविदों एवं शोधार्थियों में विशेष उत्साह देखने को मिला। संगोष्ठी के लिए देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं शिक्षण संस्थानों से 65 से अधिक शोधपत्र प्राप्त हुए, जिनमें संत शिरोमणि गुरु रविदास जी के दर्शन, शिक्षाओं, सामाजिक चिंतन, समानता, मानवता एवं समरसता जैसे विभिन्न पक्षों पर शोधपरक विचार प्रस्तुत किए गए।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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