— डॉ. प्रियंका सौरभ
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि यहाँ जनता को सरकार से सवाल पूछने का अधिकार है। यही अधिकार लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखता है। जब किसी सरकारी व्यवस्था में कमी दिखाई देती है, जब किसी परीक्षा में गड़बड़ी होती है, जब युवाओं के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग जाता है, तब विरोध केवल स्वाभाविक ही नहीं बल्कि आवश्यक भी होता है। किंतु लोकतंत्र की यही शक्ति तब कमजोर पड़ने लगती है जब किसी वास्तविक मुद्दे का केंद्र धीरे-धीरे बदलकर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, वैचारिक ध्रुवीकरण और सत्ता संघर्ष में परिवर्तित हो जाता है। तब मूल प्रश्न पीछे छूट जाता है और राजनीतिक लाभ-हानि का गणित आगे आ जाता है।
नीट परीक्षा में कथित पेपर लीक और अन्य अनियमितताओं ने पूरे देश को झकझोर दिया। लाखों विद्यार्थियों ने वर्षों तक कठिन परिश्रम किया, परिवारों ने अपनी आर्थिक क्षमता से कहीं अधिक खर्च कर बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार किया, लेकिन जब परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठे तो स्वाभाविक रूप से छात्रों और अभिभावकों का विश्वास डगमगाया। ऐसी स्थिति में सरकार से जवाब मांगना, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की अपेक्षा करना और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग करना पूरी तरह उचित है। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की पहली जिम्मेदारी यही होती है कि वह नागरिकों, विशेषकर युवाओं के भविष्य से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करे।
यह भी उतना ही सत्य है कि किसी भी पेपर लीक की घटना को केवल एक प्रशासनिक चूक कहकर टाला नहीं जा सकता। यह केवल प्रश्नपत्र की चोरी नहीं, बल्कि लाखों सपनों के साथ विश्वासघात है। ऐसे अपराधों में शामिल व्यक्तियों, गिरोहों अथवा अधिकारियों की निष्पक्ष जांच और शीघ्र दंड आवश्यक है। यदि व्यवस्था में कमियाँ हैं तो उन्हें दूर करना सरकार की जिम्मेदारी है। परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से अधिक सुरक्षित बनाना, डिजिटल निगरानी बढ़ाना, उत्तरदायित्व तय करना और समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करना अब केवल विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पक्ष भी सामने आया। जैसे-जैसे विरोध प्रदर्शन बढ़े, अनेक स्थानों पर मूल मुद्दे की जगह राजनीतिक विमर्श ने ले ली। विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और वैचारिक समूहों ने इस विषय को अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना शुरू किया। छात्रहित का प्रश्न धीरे-धीरे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का माध्यम बन गया। कुछ मंचों पर सरकार की नीतियों की आलोचना हुई, तो कहीं पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर प्रश्नचिह्न लगाए गए। कहीं-कहीं भाषा की मर्यादा भी टूटती दिखाई दी। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या आंदोलन का लक्ष्य छात्रों को न्याय दिलाना था या राजनीतिक लाभ अर्जित करना?
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। विपक्ष सरकार से प्रश्न पूछता है, नीतियों की समीक्षा करता है और जनता की आवाज़ को संसद तथा सड़कों तक पहुँचाता है। इसी प्रकार सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी केवल अपनी उपलब्धियाँ गिनाना नहीं, बल्कि जनता की शंकाओं का उत्तर देना भी है। लोकतंत्र तब स्वस्थ रहता है जब दोनों पक्ष अपनी संवैधानिक भूमिका का सम्मान करें। किंतु यदि हर मुद्दा केवल राजनीतिक लाभ और हानि के तराजू पर तौला जाने लगे तो सबसे अधिक नुकसान आम नागरिक का होता है।
भारत का लोकतंत्र अनेक कठिन दौरों से गुजरा है। स्वतंत्रता के बाद देश ने राजनीतिक अस्थिरता भी देखी और आपातकाल जैसा दौर भी, जब नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगे। उसी इतिहास ने यह भी सिखाया कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान नहीं करता, बल्कि जागरूक नागरिक भी करते हैं। आज परिस्थितियाँ भिन्न हैं। सोशल मीडिया ने प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने का मंच दिया है। सरकारों की आलोचना पहले से कहीं अधिक खुलकर होती है। यह लोकतंत्र की शक्ति का परिचायक है। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अभद्रता में अंतर बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। असहमति लोकतांत्रिक अधिकार है, किन्तु व्यक्तिगत अपमान, घृणा और दुष्प्रचार किसी भी स्वस्थ समाज को कमजोर करते हैं।
आज सोशल मीडिया ने संवाद को जितना सरल बनाया है, उतना ही जटिल भी। अपुष्ट सूचनाएँ, आधे-अधूरे वीडियो, भावनात्मक पोस्ट और राजनीतिक प्रचार कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाते हैं। परिणामस्वरूप कई बार वास्तविक मुद्दा तथ्यों से अधिक भावनाओं के आधार पर तय होने लगता है। नीट विवाद के दौरान भी अनेक प्रकार की सूचनाएँ और दावे सामने आए। ऐसे समय में नागरिकों, मीडिया और राजनीतिक दलों—सभी की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे केवल सत्यापित तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखें।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को लेकर देश में अलग-अलग मत हैं। उनके समर्थक बुनियादी ढाँचे के विस्तार, डिजिटल शासन, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती भूमिका और कई कल्याणकारी योजनाओं को उनकी उपलब्धियाँ मानते हैं। वहीं उनके आलोचक बेरोज़गारी, महँगाई, सामाजिक तनाव और कुछ प्रशासनिक निर्णयों पर गंभीर प्रश्न उठाते हैं। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का अधिकार मिले। किसी भी नेता का मूल्यांकन केवल लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उसके निर्णयों, परिणामों और जवाबदेही से होना चाहिए।
यह भी ध्यान रखना होगा कि चुनाव लोकतंत्र का अंतिम नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण चरण हैं। जनता अपने विवेक से उपलब्ध विकल्पों में से किसी एक को चुनती है। इसका अर्थ यह नहीं कि चुनी हुई सरकार आलोचना से ऊपर हो जाती है। उसी प्रकार यह भी उचित नहीं कि प्रत्येक सरकारी निर्णय को बिना तथ्यों के नकार दिया जाए। लोकतंत्र का संतुलन इसी में है कि उपलब्धियों को स्वीकार किया जाए और कमियों पर स्पष्ट प्रश्न भी उठाए जाएँ।
नीट विवाद ने शिक्षा व्यवस्था की एक गहरी समस्या को उजागर किया है। भारत में प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल परीक्षा नहीं रह गईं, बल्कि करोड़ों परिवारों की सामाजिक और आर्थिक आकांक्षाओं का आधार बन चुकी हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार की अनियमितता केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास का संकट बन जाती है। इसलिए आवश्यक है कि परीक्षा प्रणाली को राजनीतिक बहस का स्थायी विषय बनाने के बजाय संस्थागत सुधार का अवसर बनाया जाए।
राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करना चाहिए। यदि किसी छात्र आंदोलन का नेतृत्व राजनीतिक मंचों के माध्यम से होगा तो जनता स्वाभाविक रूप से उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न उठाएगी। इसी प्रकार यदि सरकार केवल विपक्ष की आलोचना को राजनीति कहकर टाल देगी तो जनता का विश्वास भी कम होगा। समाधान टकराव में नहीं, बल्कि संवाद में है। लोकतंत्र में संवाद ही वह माध्यम है जिसके द्वारा असहमति को भी सकारात्मक दिशा दी जा सकती है।
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह किसी भी आंदोलन का समर्थन या विरोध तथ्यों के आधार पर करे। किसी भी धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के विरुद्ध घृणा फैलाना किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की भावना के विपरीत है। यदि किसी वास्तविक मुद्दे को सामाजिक विभाजन का माध्यम बनाया जाता है तो अंततः उसका सबसे बड़ा नुकसान उसी उद्देश्य को होता है जिसके लिए आंदोलन प्रारंभ किया गया था।
आज आवश्यकता केवल दोष तय करने की नहीं, बल्कि भविष्य सुरक्षित करने की है। परीक्षा प्रणाली में आधुनिक तकनीक का उपयोग, प्रश्नपत्र सुरक्षा के बेहतर मानक, पारदर्शी जांच, समयबद्ध न्याय, दोषियों के विरुद्ध कठोर दंड तथा विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रभावी सहायता व्यवस्था—ये सभी सुधार समय की मांग हैं। यदि इन पर गंभीरता से अमल होता है तो भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है।
लोकतंत्र की सफलता केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं मापी जाती। उसकी वास्तविक कसौटी यह है कि नागरिकों का विश्वास संस्थाओं में कितना बना हुआ है। सरकार की जवाबदेही जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण जनता की जिम्मेदारी भी है। विरोध आवश्यक है, लेकिन विरोध का उद्देश्य समाधान होना चाहिए, अराजकता नहीं। आलोचना आवश्यक है, लेकिन उसका आधार तथ्य होने चाहिए, पूर्वाग्रह नहीं। समर्थन भी आवश्यक है, लेकिन वह अंधानुकरण नहीं, विवेकपूर्ण विश्वास पर आधारित होना चाहिए।
अंततः प्रश्न केवल नीट का नहीं है। प्रश्न उस व्यवस्था का है जिस पर देश के करोड़ों युवाओं का भविष्य निर्भर करता है। प्रश्न उस लोकतंत्र का भी है जो हर नागरिक को अपनी बात कहने का अधिकार देता है। यदि हम इन दोनों की गरिमा बनाए रखने में सफल होते हैं तो यही इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। विद्यार्थियों को न्याय मिले, दोषियों को दंड मिले, संस्थाएँ और मजबूत हों तथा राजनीतिक दल छात्रहित को दलहित से ऊपर रखें—यही किसी भी संवेदनशील लोकतंत्र की पहचान है। क्योंकि लोकतंत्र तब सबसे अधिक मजबूत होता है जब हर संघर्ष का अंतिम लक्ष्य सत्ता नहीं, समाज का विश्वास और राष्ट्र का भविष्य हो।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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