संत कबीर दास का संपूर्ण जीवन दर्शन मानवता, समता, और एकेश्वरवाद पर आधारित था। उन्होंने जाति पाति, छुआछूत, और धार्मिक पाखंडों का पुरजोर विरोध किया। संत कबीर के अनुसार, ईश्वर एक है और सभी मनुष्य समान हैं। सच्चा ज्ञान व सदाचार ही मनुष्य की पहचान है। संत कबीर सनातन संस्कृति की शाश्वत चिंतन धारा की अमूल्य निधि है। संत कबीर दास की जयंती के उपलक्ष्य में मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने यह विचार मातृभूमि शिक्षा मंदिर द्वारा आयोजित भक्ति संवाद कार्यक्रम में व्यक्त किए। कार्यक्रम का शुभारंभ मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों द्वारा संत कबीर दास के चित्र के समक्ष भजन प्रस्तुति से हुआ।
भक्ति संवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ.श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा संत कबीर भक्तिकाल के निर्गुण भक्ति धारा के ज्ञान मार्गी शाखा के प्रमुख कवि थे। 15वीं शताब्दी के एक प्रमुख संत, कवि, कबीर ने अपने समय की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक व्यवस्था पर गहन प्रश्न उठाए। कबीर का दर्शन जाति और धर्म की सीमाओं से परे था। वे एक ऐसे समाज की कल्पना करते थे जहां सभी लोग प्रेम, दया और भाईचारे के साथ रहें। उन्होंने जन्म या पद की अपेक्षा व्यक्ति के कर्म और चरित्र को अधिक महत्व दिया। उनके लिए सच्चा साधु वह है जो ज्ञानवान और चरित्रवान हो। कबीर भले ही अनपढ़ थे, फिर भी उनके उपदेश, उनका विचार आज के समाज में भी प्रासंगिक है। वे देशवासियों के मानस में आज भी जिंदा है, उनकी वाणी किताबों तक सीमित नहीं रहीं। उनकी वाणी हमारी संस्कृति में, हमारी पीढ़ी में आज भी जीवित है।
डॉ.श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा आज भी समाज में मानवता कराह रही है। कबीर उस समानता के पक्षधर थे। वे कहते हैं, ऊँचे कुल में जन्मे लेने मात्र से कोई ऊँचा या श्रेष्ट नहीं होता। अपने आचरण और सुन्दर कर्मों से ही मनुष्य ऊँचा बन जाता है। संत कबीर दास को तत्कालीन विसंगतियों एवं विकृतियों के विरुद्ध लड़ने का अथक दृढ़ता का साहस उन्हें जीवनानुभव से मिला था। उनके जीवन संघर्ष आज भी यथावत है। उनकी हर बात आज उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके समय मे थी। कबीर भारत एवं भारतीयता के पोषक थे। कार्यक्रम का समापन कबीर वाणी से हुआ। कार्यक्रम में आश्रम के सदस्य, विद्यार्थी आदि उपस्थित रहे।
