श्रीमद्भगवद्गीता में सेवा धर्म को कर्मयोग एवं भक्ति का सर्वोच्च आधार माना गया है। गीता के अनुसार, बिना किसी स्वार्थ या फल की इच्छा के समाज और संसार की भलाई के लिए किया गया कर्तव्य ही सच्ची सेवा है। सेवा धर्म कर्म और भक्ति का वह मार्ग है, जो मनुष्य को आध्यात्मिक सिद्धि और आंतरिक शांति प्रदान करता है। मातृभूमि शिक्षा मंदिर द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता में सेवा धर्म विषय पर आयोजित गीता संवाद कार्यक्रम में मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने व्यक्त किए। गीता संवाद कार्यक्रम का शुभारंभ भारतमाता एवं योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलन से हुआ।
गीता संवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार अपनी क्षमताओं को ईश्वर की देन मानकर समाज के हर जरूरतमंद की सेवा को ईश्वर की पूजा समझकर करना ही सेवा धर्म है। सफलता और असफलता, लाभ और हानि या सुख-दुःख में समान रहकर अपना कर्तव्य निभाना ही वास्तविक सेवा है। जीवन में
अपने निर्धारित कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना ही सबसे बड़ा सेवा धर्म है।
डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा अपने स्वार्थों से ऊपर उठकर दूसरों के कल्याण के लिए कर्म करना और निस्वार्थ भाव से समर्पित रहना ही गीता का मूल सेवा धर्म है। गीता का सेवा धर्म ऊँच नीच एवं समस्त असमानता के भेद से परे है। निस्वार्थ सेवा के लिए समाज के सभी प्राणी समान होते हैं।सेवा ही ईश्वर की पूजा है। समस्त जीवों में परमात्मा का अंश माना गया है। अतः मानव मात्र या सृष्टि की सेवा प्रत्यक्ष रूप से सर्वोच्च शक्ति की ही सेवा है। आज गीता में वर्णित सेवा धर्म को आत्मसात करके ही भारत राष्ट्र को एक विकसित राष्ट्र बनाया जा सकता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए दिल्ली के वरिष्ठ समाजसेवी रामेश्वर दास गर्ग ने कहा मातृभूमि सेवा मिशन के सेवा प्रकल्प वास्तविक रूप से गीता के निष्काम कर्म का प्रत्यक्ष स्वरूप है। गीता संवाद कार्यक्रम को डॉ. सुनेंद्र सिंह राणा, सुमित शर्मा, डॉ. अत्मेश कुमार, डॉ.आशीष पोद्दार एवं सतवीर सिंह सैनी जी बतौर अतिविशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे और अपने उद्बोधन दिया। गीता संवाद कार्यक्रम में मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों ने भी प्रस्तुति दी। कार्यक्रम में मातृभूमि सेवा मिशन के सदस्य, विद्यार्थी सहित अनेक गणमान्य जन उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन वन्देमातरम से हुआ।
