– डॉ सत्यवान सौरभ
हरियाणा की शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ प्रश्न केवल संसाधनों की कमी का नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं के गहरे संकट का है। हालिया रिपोर्टें यह उजागर करती हैं कि जिस शिक्षा व्यवस्था पर समाज के बौद्धिक और नैतिक भविष्य का दारोमदार है, वही व्यवस्था प्रशासनिक उदासीनता और अव्यवस्थित नीतियों की भेंट चढ़ती जा रही है। शिक्षक, जो किसी भी राष्ट्र के निर्माण की बुनियादी इकाई होता है, आज कक्षा के बजाय फाइलों और सरकारी आदेशों के बोझ तले दबा हुआ है। परिणामस्वरूप पढ़ाई हाशिये पर चली गई है और पूरा तंत्र औपचारिकताओं की गिरफ्त में जकड़ा दिखाई देता है।
सरकारी स्कूलों में लगभग 29,800 शिक्षकों के पद रिक्त होना किसी सामान्य प्रशासनिक चूक का संकेत नहीं है, बल्कि यह एक दीर्घकालिक लापरवाही का प्रतिफल है। उच्च शिक्षा की स्थिति और भी चिंताजनक है, जहाँ कॉलेजों में प्रोफेसरों के लगभग आधे पद खाली पड़े हैं। यह केवल संख्या का प्रश्न नहीं है, बल्कि उस शैक्षणिक शून्य का संकेत है जो धीरे-धीरे पूरी पीढ़ी को प्रभावित कर रहा है। जब शिक्षक-छात्र अनुपात असंतुलित होगा, तो शिक्षा की गुणवत्ता स्वतः ही गिरावट की ओर जाएगी।
एक ही शिक्षक से कई-कई कक्षाओं और विषयों को संभालने की अपेक्षा की जा रही है। ऐसे में न तो विषय की गहराई संभव है और न ही छात्रों को व्यक्तिगत मार्गदर्शन मिल पाता है। शिक्षक थकान, दबाव और समयाभाव से जूझता हुआ केवल पाठ्यक्रम पूरा करने की औपचारिकता निभा रहा है। शिक्षा का उद्देश्य, जो जिज्ञासा, विवेक और आलोचनात्मक सोच विकसित करना होना चाहिए, वह केवल परीक्षा-केंद्रित गतिविधि बनकर रह गया है।
स्थिति को और विकट बनाता है शिक्षकों पर थोपे गए गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ। लगभग पच्चीस प्रकार के ऐसे कार्य हैं, जिनका शिक्षा से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, किंतु उनका सबसे बड़ा भार शिक्षक को ही उठाना पड़ता है। चुनाव ड्यूटी, जनगणना, सर्वेक्षण, विभागीय रिपोर्टें, विभिन्न पोर्टलों पर डेटा अपलोड, छात्रवृत्ति और पहचान पत्रों का सत्यापन—इन सबके बीच शिक्षक की मूल भूमिका कहीं खो जाती है। शिक्षक अब ज्ञान का संवाहक नहीं, बल्कि एक बहुउद्देशीय सरकारी कर्मचारी बनता जा रहा है।
जब शिक्षक का अधिकांश समय कागज़ी कार्यों और प्रशासनिक दबावों में व्यतीत होगा, तो कक्षा की तैयारी, नवाचार और विद्यार्थियों के साथ संवाद के लिए समय कहाँ बचेगा? यह प्रश्न केवल शिक्षक के कार्यभार का नहीं है, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की सोच पर सवाल खड़ा करता है। क्या हम शिक्षक को एक बौद्धिक मार्गदर्शक मानते हैं या मात्र आदेश पालन करने वाला कर्मचारी?
इस अव्यवस्था का सीधा प्रभाव माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा के परिणामों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 10वीं और 12वीं के कई सरकारी स्कूलों में परिणाम अत्यंत कमजोर या शून्य तक पहुँच चुके हैं। यह स्थिति छात्रों की क्षमता पर नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता पर उंगली उठाती है। जब पढ़ाने वाला ही पढ़ा नहीं पा रहा, तो सीखने वाले से उत्कृष्ट प्रदर्शन की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
हर साल परीक्षा परिणामों के साथ चिंता व्यक्त की जाती है, समितियाँ बनती हैं, रिपोर्टें तैयार होती हैं, किंतु मूल समस्याएँ जस की तस बनी रहती हैं। शिक्षक भर्ती में देरी, संसाधनों का असमान वितरण और नीतिगत अस्पष्टता इस गिरावट को लगातार गहरा करती जा रही है। परिणामस्वरूप अभिभावकों का भरोसा सरकारी स्कूलों से उठता जा रहा है और निजी स्कूलों व कोचिंग संस्थानों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, जिससे शिक्षा एक सामाजिक अधिकार के बजाय बाजार की वस्तु बनती जा रही है।
ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में स्थिति और भी चिंताजनक है। कई स्कूल ऐसे हैं जो एक या दो शिक्षकों के सहारे चल रहे हैं। विषय विशेषज्ञों का अभाव है, प्रयोगशालाएँ निष्क्रिय हैं और पुस्तकालय केवल औपचारिक उपस्थिति तक सीमित हैं। इन क्षेत्रों के छात्र पहले ही सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे होते हैं, ऊपर से कमजोर शिक्षा व्यवस्था उनके अवसरों को और सीमित कर देती है। इससे शहरी और ग्रामीण शिक्षा के बीच की खाई और चौड़ी हो रही है, जो सामाजिक समानता के संवैधानिक लक्ष्य के विपरीत है।
नीतियों और योजनाओं की कोई कमी नहीं है। डिजिटल शिक्षा, स्मार्ट कक्षाएँ, नई शिक्षा नीति जैसे शब्द काग़ज़ों और भाषणों में खूब चमकते हैं, किंतु ज़मीनी सच्चाई यह है कि जब शिक्षक ही पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं होंगे और उन्हें शिक्षण के लिए आवश्यक स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, तो तकनीक केवल दिखावा बनकर रह जाएगी। शिक्षा नीति शिक्षक को केंद्र में रखने की बात करती है, लेकिन व्यवहार में वही शिक्षक सबसे अधिक उपेक्षित दिखाई देता है।
प्रशासनिक दृष्टिकोण अब भी शिक्षा को एक विभागीय कार्यभार के रूप में देखता है, न कि राष्ट्र निर्माण के सबसे महत्वपूर्ण निवेश के रूप में। आदेश ऊपर से जारी होते हैं और बिना यह सोचे लागू कर दिए जाते हैं कि उनका कक्षा और छात्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यह दृष्टिकोण न केवल शिक्षा की आत्मा के विरुद्ध है, बल्कि शिक्षक के मनोबल को भी गहरे स्तर पर प्रभावित करता है।
समाधान कठिन नहीं हैं, बस इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। खाली पदों को भरने के लिए त्वरित और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया अपनानी होगी। गैर-शैक्षणिक कार्यों के लिए अलग तंत्र विकसित करना होगा ताकि शिक्षक अपना समय और ऊर्जा कक्षा को दे सके। ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षकों को विशेष प्रोत्साहन और सुविधाएँ देनी होंगी। प्रशिक्षण और अकादमिक स्वतंत्रता के माध्यम से शिक्षक को फिर से सीखने और सिखाने की प्रक्रिया से जोड़ा जाना होगा।
अंततः यह समझना होगा कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम और परीक्षा का नाम नहीं है। यह समाज की सोच, संवेदना और दिशा तय करती है। यदि शिक्षक फाइलों में उलझा रहेगा, तो आने वाली पीढ़ियाँ दिशाहीन हो जाएँगी। हरियाणा के लिए यह समय आत्ममंथन का है—क्या शिक्षा वास्तव में प्राथमिकता है या केवल सरकारी घोषणाओं का विषय?
जब तक शिक्षक को उसके वास्तविक दायित्व में सम्मान और स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, तब तक किसी भी सुधार की कल्पना अधूरी रहेगी। हाशिये पर जाती पढ़ाई केवल शिक्षा का संकट नहीं है, यह पूरे समाज के भविष्य का संकट है।

By Dr. Rajesh Wadhwa

778-779, Partap Colony, Railway Road, Near Rudra Cinema, Opp Chaat King India Row, Kurukshetra 136118 Mob. 9896352867, 9467040367

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *