(सफलता का एकमात्र पैमाना नहीं है यू.पी.एस.सी., यू.पी.एस.सी. से आगे भी है सफलता की दुनिया)
– डॉ. सत्यवान सौरभ
हाल ही में संघ लोक सेवा आयोग (यू.पी.एस.सी.) के परिणाम घोषित हुए हैं। हर वर्ष की तरह इस बार भी सफल अभ्यर्थियों की कहानियाँ सुर्खियों में हैं। टॉपर्स के इंटरव्यू, उनकी रणनीति, उनकी मेहनत और संघर्ष की चर्चा पूरे देश में हो रही है। यह स्वाभाविक भी है। वर्षों की कठिन तैयारी के बाद जो युवा इस परीक्षा में सफल होते हैं, उनकी उपलब्धि निश्चित ही प्रशंसा के योग्य है।
लेकिन इस उत्सव के बीच एक दूसरा पक्ष भी है, जिस पर कम चर्चा होती है। वह है यू.पी.एस.सी. के इर्द-गिर्द हमारे समाज में बनती वह मानसिकता, जिसने इस परीक्षा को केवल एक अवसर नहीं बल्कि सफलता का अंतिम पैमाना बना दिया है।
धीरे-धीरे हमारे सामाजिक वातावरण में यह धारणा गहराती गई है कि पढ़ाई का सबसे बड़ा उद्देश्य यू.पी.एस.सी. है। घरों में, रिश्तेदारों की बातचीत में, यहां तक कि स्कूल-कॉलेज के माहौल में भी अक्सर यही संदेश सुनाई देता है कि असली सफलता वही है जो इस परीक्षा से होकर गुज़रे। किसी घर में यदि कोई युवक या युवती भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) या भारतीय पुलिस सेवा (IPS) में चयनित हो जाता है तो वह पूरे परिवार और मोहल्ले के लिए गर्व का विषय बन जाता है। यह गर्व स्वाभाविक है, लेकिन इसके साथ एक अनकहा संदेश भी समाज में फैलता है—जो इस परीक्षा में सफल नहीं हुआ, वह शायद उतना सफल नहीं है।
यही सोच कई बार लाखों युवाओं के मन पर अनावश्यक दबाव बना देती है। 18–19 वर्ष की आयु में जब कोई छात्र अपने भविष्य के बारे में सोच रहा होता है, तब अक्सर उसके सामने यू.पी.एस.सी. को ही सबसे बड़ा लक्ष्य बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि इन युवाओं में से बहुत कम लोग वास्तव में शासन व्यवस्था, नीति निर्माण या सार्वजनिक सेवा की जटिलताओं को समझते हुए इस दिशा में आगे बढ़ते हैं। कई बार यह निर्णय प्रेरणा से अधिक सामाजिक प्रतिष्ठा की कल्पना से प्रेरित होता है।
सोशल मीडिया के दौर में यह प्रवृत्ति और तेज हुई है। छोटी-छोटी वीडियो क्लिप, वर्दी में अधिकारियों की छवियाँ, “कलेक्टर साहब” या “सुपरकॉप” जैसे लोकप्रिय चित्रण युवाओं के मन में एक आकर्षक छवि बनाते हैं। लेकिन इन छवियों के पीछे की वास्तविकता—लंबे कार्य घंटे, प्रशासनिक जटिलताएँ, प्राकृतिक आपदाओं के समय निरंतर जिम्मेदारी, राजनीतिक दबाव और निर्णयों की कठिनाइयाँ—इनका उल्लेख शायद ही कभी होता है।
इस परीक्षा से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण प्रश्न भाषा का भी है। पिछले कुछ वर्षों में यू.पी.एस.सी. के परिणामों में हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों का प्रतिनिधित्व लगातार घटता दिखाई देता है। यह केवल भाषा का सवाल नहीं है, बल्कि अवसरों की समानता से जुड़ा मुद्दा भी है। देश के छोटे शहरों और कस्बों से आने वाले अनेक छात्र सीमित संसाधनों में इस परीक्षा की तैयारी करते हैं। उनके सामने अंग्रेज़ी भाषा की चुनौती होती है, अध्ययन सामग्री की कमी होती है और महंगी कोचिंग व्यवस्था भी एक बाधा बनती है।
विडंबना यह है कि जिन अधिकारियों को देश की विविध जनता के साथ काम करना होता है, वही जनता प्रायः अपनी स्थानीय भाषाओं में सोचती और बोलती है। हिंदी, भोजपुरी, मैथिली, अवधी या अन्य भारतीय भाषाएँ केवल संचार का माध्यम ही नहीं बल्कि सामाजिक अनुभवों की अभिव्यक्ति भी हैं। यदि चयन की प्रक्रिया में भाषाई असमानता का अनुभव बढ़ता है, तो यह चिंता का विषय होना चाहिए।
इसके साथ ही हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि देश का निर्माण केवल प्रशासनिक सेवाओं से नहीं होता। आज भारत की प्रगति में वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, उद्यमियों, शिक्षकों, डॉक्टरों और तकनीकी विशेषज्ञों का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काम करने वाले हजारों युवा देश की डिजिटल संरचना को मजबूत बना रहे हैं। स्टार्ट-अप जगत में नए विचार किसानों, छोटे व्यापारियों और आम नागरिकों की समस्याओं के समाधान खोज रहे हैं।
फिर भी इन पेशों को वह सामाजिक प्रतिष्ठा शायद ही मिलती है जो सिविल सेवा से जुड़ी छवि को प्राप्त होती है। यह असंतुलन युवाओं के करियर विकल्पों को भी प्रभावित करता है। कई प्रतिभाशाली छात्र केवल सामाजिक अपेक्षाओं के कारण वर्षों तक यू.पी.एस.सी. की तैयारी में लगे रहते हैं, जबकि उनकी क्षमता अन्य क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय योगदान दे सकती है।
यह भी एक कठोर सच्चाई है कि लाखों अभ्यर्थियों में से केवल कुछ सौ ही इस परीक्षा में अंतिम रूप से सफल हो पाते हैं। बाकी अभ्यर्थियों के लिए यह प्रक्रिया कई बार लंबी और मानसिक रूप से कठिन साबित होती है। कुछ छात्र पाँच-छह वर्ष तक लगातार प्रयास करते हैं। इस दौरान उनकी उम्र, आर्थिक संसाधन और कई बार व्यक्तिगत संबंध भी प्रभावित होते हैं। असफलता की स्थिति में उन्हें यह महसूस कराया जाता है मानो उनका संघर्ष व्यर्थ हो गया हो।
वास्तव में यह दृष्टिकोण ही सबसे बड़ी समस्या है। किसी परीक्षा में सफलता या असफलता किसी व्यक्ति की संपूर्ण क्षमता या मूल्य का निर्धारण नहीं कर सकती। यू.पी.एस.सी. एक महत्वपूर्ण परीक्षा अवश्य है, लेकिन यह जीवन की संभावनाओं का अंतिम दरवाज़ा नहीं है।
समाज के रूप में हमें यह समझना होगा कि सफलता के अनेक रास्ते होते हैं। यदि हम युवाओं को केवल एक ही मार्ग को सर्वोच्च बताकर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेंगे, तो अनजाने में हम उनकी संभावनाओं को सीमित कर देंगे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम यू.पी.एस.सी. जैसी परीक्षाओं का सम्मान करते हुए भी उन्हें जीवन का एकमात्र लक्ष्य न बनने दें। युवाओं को यह भरोसा दिया जाना चाहिए कि उनकी मेहनत, उनकी प्रतिभा और उनका योगदान किसी एक परिणाम से कम नहीं हो जाता।
हर पेशे की अपनी गरिमा है और हर जिम्मेदारी का समाज में अपना महत्व है। यदि हम यह संतुलित दृष्टिकोण विकसित कर पाए, तो न केवल युवाओं पर अनावश्यक दबाव कम होगा बल्कि देश को विविध क्षेत्रों में प्रतिभाशाली और समर्पित नागरिक भी मिलेंगे।
अंततः यह याद रखना चाहिए कि किसी भी परीक्षा का परिणाम केवल एक अवसर तय करता है, किसी व्यक्ति का मूल्य नहीं। जीवन की संभावनाएँ उससे कहीं व्यापक होती हैं—और वही संभावनाएँ किसी समाज की वास्तविक ताकत होती हैं।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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