– डॉ. प्रियंका सौरभ
कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर लिखना आसान नहीं होता। वे केवल शब्दों की नहीं, बल्कि सामाजिक, मानसिक और नैतिक साहस की भी माँग करते हैं। यह विषय भी उन्हीं में से एक है, जहाँ चुनौती केवल प्रस्तुति की नहीं, बल्कि उस सच को सामने लाने की है जिसे समाज अक्सर ढककर रखना चाहता है। संस्कृति की आड़ में या आधुनिकता के नाम पर जिस चुपचाप गिरावट को स्वीकार किया जा रहा है, उस पर प्रश्न उठाना अब ज़रूरी हो गया है। आज जब परिवार की पवित्र संस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, ‘वाइफ स्वैपिंग’ जैसी प्रवृत्ति न केवल वैवाहिक बंधनों को चुनौती दे रही है, बल्कि पूरे समाज के मूल्यों को झकझोर रही है।
“वाइफ स्वप्पिंग” सुनते ही अधिकतर लोग इसे पश्चिमी संस्कृति या महानगरों तक सीमित मान लेते हैं। यह सोच हमें आत्मसंतोष देती है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक असहज और व्यापक है। क्या यह प्रवृत्ति वास्तव में केवल बड़े शहरों तक सीमित है, या फिर इसकी छाया गाँवों और छोटे कस्बों तक भी पहुँच चुकी है—बस हम उसे देखने से बच रहे हैं? उत्तर प्रदेश, केरल और लद्दाख जैसे क्षेत्रों से सामने आए मामले बताते हैं कि यह समस्या ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर मौजूद है।
यह विषय सनसनी फैलाने के लिए नहीं, बल्कि समाज के भीतर बदलते रिश्तों को समझने के लिए ज़रूरी है। यह विवाह संस्था की कमजोर होती नींव, रिश्तों में बढ़ती दरार और आधुनिकता के नाम पर मूल्यों की गलत व्याख्या की ओर ध्यान दिलाता है। यह केवल शारीरिक इच्छा का प्रश्न नहीं, बल्कि असुरक्षा, मानसिक अधूरापन, संवादहीनता और सामाजिक पाखंड का परिणाम भी है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इसमें भावनात्मक शोषण, ईर्ष्या और विश्वास का पूर्ण विघटन होता है।
इस तरह के संवेदनशील विषय को संतुलित और मर्यादित भाषा में रखना अत्यंत आवश्यक है, ताकि गंभीरता बनी रहे। यह भी सामने आता है कि किस प्रकार सामान्य दिखने वाले परिवार धीरे-धीरे ऐसे कुचक्र में फँस जाते हैं, जहाँ रिश्ते भावनाओं की जगह समझौते और दिखावे का रूप ले लेते हैं। बैंगलोर, हापुड़ जैसे स्थानों से सामने आए मामले इसकी पुष्टि करते हैं।
आज यह मान लेना भूल होगी कि ऐसी प्रवृत्तियाँ केवल महानगरों तक सीमित हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट ने जहाँ स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के नए रास्ते खोले हैं, वहीं मूल्यों के क्षरण को भी आसान बना दिया है। आभासी दुनिया में “सामान्य” लगने वाली भाषा, व्यवहार और रिश्ते वास्तविक जीवन में परिवारों की नींव हिला रहे हैं। आईटी क्रांति, उपभोक्तावादी संस्कृति और पश्चिमी प्रभाव ने युवा वर्ग में प्रयोग की होड़ बढ़ाई है। आर्थिक असमानता, संयुक्त परिवार का विघटन और महिलाओं की आर्थिक निर्भरता इसे बढ़ावा दे रही हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से यह यौन असंतोष, ईर्ष्या और रोमांच की तलाश से उपजता है।
भारतीय संदर्भ में यह पुरुषप्रधान समाज की देन है। पत्नियाँ डर के मारे चुप रहती हैं—तलाक का कलंक, आर्थिक असुरक्षा या परिवार का विघटन। सोशल मीडिया ग्रुप्स ने इसे संगठित रूप दिया है। टियर-2 शहरों में तकनीक-साक्षर युवा इसमें लिप्त हैं। इसके प्रभाव विनाशकारी हैं। वैवाहिक स्तर पर विश्वास टूटता है, ईर्ष्या बढ़ती है, भावनात्मक लगाव नए पार्टनर से हो जाता है। बच्चों पर असर लंबे समय तक रहता है—वे असुरक्षा और रिश्तों की अस्थिरता सीखते हैं। विस्तारित परिवार समर्थन छोड़ देता है। समाज स्तर पर यह नैतिक क्षय और महिलाओं के शोषण को बढ़ावा देता है। भारत में परिवार संरचना बदल रही है, लेकिन यह विकृति नई चुनौतियाँ ला रही है।
यह विमर्श केवल प्रश्न खड़े नहीं करता, बल्कि समाधान की ओर भी संकेत करता है। परिवार स्तर पर खुला संवाद, काउंसलिंग, भावनात्मक अंतरंगता आवश्यक है। समाज स्तर पर स्कूलों में नैतिक शिक्षा, महिलाओं का सशक्तिकरण ज़रूरी है। कानूनी स्तर पर IPC धाराओं का सख्त उपयोग, परिवार परामर्श नीतियाँ बनानी चाहिए।
यह विषय अश्लीलता नहीं, बल्कि समाज का आईना है। यह पाठक को असहज करता है, सोचने पर मजबूर करता है। शायद इसी असहजता में इसका सबसे बड़ा सामाजिक महत्व निहित है—कि हम अपने रिश्तों को पुनः परिभाषित करें। समय है जागने का।
  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

By Dr. Rajesh Wadhwa

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