मानसिक शांति के लिए गीता अध्ययन जरूरी :डेनियल ह्यूम
श्रीमद्भगवद्गीता में स्वदेशी की अवधारणा निहित : प्रो. सुनील ढींगरा
केयू यूआईईटी संस्थान में प्लेनरी सत्र में विद्वतजनों ने गीता सार पर किया मंथन
कुरुक्षेत्र 25 नवंबर। 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के यूआईईटी संस्थान में 10वे अंतरराष्ट्रीय गीता जयंती समारोह के अंतर्गत ‘डिजिटल युद्धभूमि का शोर और गीता का सिग्नल’ विषय पर आयोजित प्लेनरी सत्र में मलेशिया से आए स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती ने बतौर मुख्य वक्ता कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता मनुष्य की चेतना को जागृत करती है। गीता मनुष्य के मन के विकारों को दूर कर उसे सही रास्ता दिखाने का कार्य करती है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मानसिक अंधकार को दूर किया और अपना ध्यान लक्ष्य पर केन्द्रित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि अगर लक्ष्य की प्राप्ति में अनुशासन नहीं है तब बुद्धि का विनाश होता है तथा व्यक्तित्व समाप्त हो जाता है। उन्होंने कहा कि जिस समय पत्र नहीं थे और सारा ज्ञान मानव के कंठस्थ होता था। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करने के लिए गीता अध्ययन जरूरी है।
इथोपिया के डैनियल ह्यूम ने कहा कि सोशल मीडिया सिग्नल्स लाइक, शेयर, कमेंट्स, रिग्रेट और अन्य प्रकार का इससे जुड़ा अन्य सिस्टम हमारे मस्तिष्क में विकार पैदा करता है ये विकार मानव को अंधकार की तरफ ले जाते हैं। इसलिए हमें योग, ध्यान और मन से अपनी मानसिक स्थिति को नियंत्रित करना चाहिए। इन सभी समस्याओं का निवारण गीता में समाहित है।
केयू डीन इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी व संस्थान के निदेशक प्रो. सुनील ढींगरा ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता में स्वदेशी की अवधारणा निहित है। गीता में प्रतिपादित कर्मयोग भी स्वदेशी पर आधारित है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति यदि अपने ‘स्व’अर्थात् अपने समुदाय, क्षेत्र और राष्ट के हित में कर्म करे, तो आर्थिक आत्मनिर्भरता सहज रूप से विकसित हो सकती है। स्वदेशी से ही देश, प्रदेश के साथ राष्ट्र की प्रगति की कल्पना कर सकते हैं इसलिए विद्यार्थियों में गीता का संचार होना बहुत जरूरी है।
मलेशिया से शिवानंद ने कहा कि गीता एक थीम है, पवित्र ग्रंथ है जिसमें मानव मूल्य समाहित है। गीता आध्यात्मिक सूचना तंत्र से ओतप्रोत है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण व अर्जुन के बीच प्रेरणात्मक संवाद है। वहीं एक शिक्षक का अपने छात्रों की भ्रांतियों को दूर करने के लिए संवाद करना जरूरी है।
इस्कॉन बहरीन से पंकज मौर्या ने कहा कि गीता शिक्षण कार्य को आज़ादी में बदल देती है और प्रत्यक्ष में गुणवत्ता को प्रदान करती है। प्रकृति में जब मनुष्य देह रूप में आता है तमो, रजो और सतोगुणी होता है। तमो आलस्य, रजो उत्तेजना तथा सतोगुण बुद्धि का विकास करता है। सतोगुण के लिए इंद्रियों को वश में करना जरूरी है।
जेएनयू के प्रो. सी उपेंद्र राव ने कहा कि गीता आध्यात्मिक और दार्शनिक चिंतन है। परमात्मा स्वतंत्र है जीव उस पर निर्भर है। वैश्विक परिवेश में सामाजिक समरसता एवं सद्भावना का संदेश गीता में निहित है।
कार्यक्रम में डॉ. रीटा, आयोजन सचिव ने सभी अतिथियों का स्वागत किया तथा सह संयोजक डॉ. संजीव आहुजा ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस मौक़े पर डॉ. राजेश अग्निहोत्री, डॉ. प्रियंका जांगड़ा, डॉ. दीपक सूद, डॉ. निखिल कुमार मारीवाला, डॉ. विशाल अहलावत, डॉ. दीपक मलिक, डॉ. अनुराधा, डॉ. प्रणय जैन, डॉ. रामावतार, डॉ. राहुल गुप्ता, डॉ. अमिता मित्तल, डॉ. शिखा, डॉ. शैफाली, शिवानी, एकता, अभिषेक सहित हरिकेश पपोसा व कुलदीप मलिक मौजूद रहे।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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