करनाल, 31 जुलाई। भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान (आईआईएमआर) लुधियाना तथा क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (सीसीएसएचएयू) करनाल द्वारा मक्का की टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने हेतु एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन इथेनॉल उद्योगों के कैचमेंट क्षेत्रों में मक्का उत्पादन में वृद्धि परियोजना के अंतर्गत किया गया। यह कार्यक्रम किसानों को तकनीकी सहायता प्रदान करने और उनकी क्षमता निर्माण के उद्देश्य से आयोजित किया गया। इस अवसर पर करनाल जिले के कुंजपुरा गांव में 50 से अधिक किसानों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रशिक्षण का उद्देश्य मक्का की उन्नत विधियों, पर्यावरण-अनुकूल और सतत कृषि पद्धतियों के बारे में किसानों को जागरूक करना था। वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं परियोजना प्रमुख डॉ. एस.एल. जाट ने मक्का की वैश्विक उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा, “विश्व स्तर पर मक्का खाद्यान्न फसलों में शीर्ष स्थान पर है। अमेरिका, चीन और ब्राज़ील जैसे देशों में इसका अत्यधिक उत्पादन होता है। अकेले अमेरिका का मक्का उत्पादन 390 मिलियन टन से अधिक है, जो भारत के कुल खाद्यान्न उत्पादन से भी ज्यादा है।” उन्होंने मक्का की उत्पादकता बढ़ाने के लिए समय पर खरपतवार नियंत्रण और पोषक तत्व प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर दिया। सीसीएसएचएयू करनाल के पैथोलॉजिस्ट डॉ. हरमिंदर ने मक्का की प्रमुख बीमारियों की पहचान और उनके एकीकृत प्रबंधन उपायों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हरियाणा जैसे राज्यों में मक्का की खेती जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने का बेहतर विकल्प है। आईआईएमआर के निदेशक डॉ. एच.एस. जाट ने अपने संदेश में बताया कि, “भारत में मक्का का उत्पादन लगभग 42 मिलियन टन है, लेकिन एथेनॉल की बढ़ती मांग को देखते हुए इसकी पैदावार को और बढ़ाना समय की आवश्यकता है। रिसर्च एसोसिएट डॉ. मनीष ककरालिया ने मक्का को जल संरक्षण और पर्यावरण की दृष्टि से लाभकारी बताया। उन्होंने यह भी बताया कि मक्का की खेती में रासायनिक खादों और सिंचाई की कम आवश्यकता होती है, जिससे खेती की लागत घटती है और भूमि की उर्वरता बनी रहती है। इस प्रशिक्षण में ग्रो इंडिगो के कार्बन प्रोजेक्ट की भी जानकारी दी गई। ग्रो इंडिगो के प्रतिनिधि नवीन कुमार ने बताया कि मक्का की खेती जलवायु के अनुकूल है, और खेतों में कार्बन प्रबंधन के लिए भी उपयोगी है। इससे न केवल पर्यावरण को लाभ होता है, बल्कि किसानों को वार्षिक मौद्रिक लाभ भी प्राप्त होता है। इस कार्यक्रम में आईआईएमआर के यंग प्रोफेशनल शुभम सैनी की भी सक्रिय भागीदारी रही। उन्होंने किसानों के साथ संवाद कर उन्नत तकनीकों और स्थायी कृषि अभ्यासों की जानकारी साझा की।
