आज संस्कृति को जीवन व्यवहार में लाने की आवश्यकता : डॉ. ललित बिहारी गोस्वामी

कुरुक्षेत्र, 24 जून। विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान में तीन दिवसीय संस्कृति बोध परियोजना अखिल भारतीय कार्यशाला का शुभारंभ मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। इस अवसर पर मंचासीन विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के अध्यक्ष डॉ. ललित बिहारी गोस्वामी, सचिव वासुदेव प्रजापति, निदेशक डॉ. रामेन्द्र सिंह, सं.बो. परियोजना के विषय संयोजक दुर्ग सिंह राजपुरोहित रहे। संस्थान के सचिव वासुदेव प्रजापति ने संस्थान द्वारा इस वर्ष से शुरू की गई ‘‘भारतीय ज्ञानपरम्परा आधारित संस्कृति बोधमाला’’ पुस्तकों पर प्रकाश डाला। संस्कृति ज्ञान परीक्षा में प्रयोग होने वाली कक्षा 3 से 12 तक की ये पुस्तकें बहुरंगी हैं, जिनके माध्यम से संस्थान द्वारा भारतीय संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने का अनूठा प्रयास किया गया है। कार्यशाला में देशभर से 82 कार्यकर्ता भाग ले रहे हैं।
संस्थान के निदेशक डॉ. रामेन्द्र सिंह ने बताया कि इस अखिल भारतीय तीन दिवसीय कार्यशाला में देशभर के लगभग सभी राज्यों से आए क्षेत्र, प्रान्त संयोजक, क्षेत्रीय अभियान संयोजक एवं सह-संयोजकों के रूप में 82 प्रतिभागी इस भयंकर गर्मी में भी सहभागिता कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि दिन भर चले सत्रों में अपने विद्या मंदिरों की सहभागिता, अध्ययन की व्यवस्था, छात्रों की परीक्षा में उपस्थिति, छात्रों का परिणाम, अन्य विद्यालयों को जोड़ना, आचार्यों की परीक्षा, परिणाम, संस्कृति प्रवाह, पुस्तक प्रेषण, प्रश्नपत्र, प्रमाण पत्र, परीक्षा परिणाम, निबंध प्रतियोगिता, चित्र संच का उपयोग इत्यादि विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। दुर्ग सिंह राजपुरोहित ने मंचासीन अधिकारियों का परिचय कराते हुए तीन दिन चलने वाली बैठक हेतु आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।
कार्यशाला को संबोधित करते हुए संस्थान के अध्यक्ष डॉ. ललित बिहारी गोस्वामी ने कहा कि हिन्दू धर्म नहीं अपितु जीवन दृष्टि है। हमें इस जीवन दृष्टि को दूसरे तक पहुंचाना चाहिए। ये जीवन दृष्टि, मूल्य, यही हमारी संस्कृति हैं और संस्कृति पूरी तब होती है जब इन जीवन मूल्यों को हम अपने जीवन में धारण करें और दूसरे के समक्ष भी रखें। उन्होंने कहा कि संसार में जितना अच्छा विचार है, वह हम तक आए, हम उसे स्वीकार करें। लेकिन हमारा जो सबसे अच्छा विचार है, वह हम सबके सामने लेकर जाएं। किसी प्रकार का भेदभाव या विभाजन हमारे व्यवहार में नहीं होना चाहिए और अगर यह भेद आता है तो हम संस्कृति के उपासक नहीं हो सकते। संस्कृति केवल ज्ञान, विचार, जीवन मूल्य नहीं है जिनकी पूजा की जाए, वह सब हमारे व्यवहार में ले आने की जरूरत है। उन्होंने महात्मा बुद्ध की करुणा और भगवान महावीर की अहिंसा को समाज के लिए बताते हुए कहा कि हमारे जीवन व्यवहार में इन तत्वों को अवश्य लाना चाहिए। डॉ. गोस्वामी ने कहा कि भारतीय संस्कृति सबको जोड़ने वाली, शांतिप्रिय है और ज्ञान का विकास, ज्ञान की साधना जहां हो सकती है, ऐसी हमारी भारत भूमि रही है। उन्होंने भारतीय धर्म ग्रन्थों पर बोलते हुए कहा कि गीता कर्तव्य बोध कराने वाला ग्रन्थ है। जीवन के लिए आवश्यक व्यवहार क्या होना चाहिए, इस बात को बताने वाला ग्रन्थ है।
उन्होंने कहा कि इस देश में जो अच्छा विचार हुआ, जो बहुत श्रेष्ठ गुणों की आराधना हमारे पूर्वजों ने की, जिन जीवन मूल्यों का अविष्कार उन्होंने किया, जीवन दर्शन को उन्होंने जिसमें देखा, ऐसे वेद, उपनिषद् इत्यादि उन वेदों की जो ऋचाएं, ब्राह्मण ग्रन्थ, वह सब हमारे देश के उसी दर्शन से अनुप्राणित है, जिसने सारे देश को एक बनाकर रखा है। कार्यशाला में हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा, तेलंगाना, असम, केरल, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, तमिलनाडु, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक आदि राज्यों प्रतिभागी सहभागिता कर रहे हैं।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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