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एनजीओ की गतिविधियों पर नजर समय की मांग

कोई एनजीओ, जिसके पास पैसे की कमी नहीं है, अपनी मनमर्जी काम करता रहेगा, चाहे वह कानून विरुद्ध ही क्यों न हो। लेकिन ऐसा करने के पहले, वह बड़ी संख्या…

बच्चे मिट्टी के घड़े, अभिभावक कुम्हार। जैसा चाहो वो बने, दे दो जो आकार।। बालमन कच्ची मिट्टी के समान, जैसा आकार देंगे, वैसा बन जाएंगे। बच्चे कच्ची मिट्टी के समान होते हैं। उन्हें जैसा आकार दो वे वैसा ढल जाते हैं। उनके मन में आर्थिक रूप से कमजोर या अन्य धर्म या जाति के विद्यार्थियों के लिए कोई भेदभाव नहीं होता। वे अपने आसपास के माहौल से ही सीखते हैं। जैसा व्यवहार उन्हें अपने आसपास मिलता है वे वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं। घर और स्कूल दोनों ही मिलकर बच्चों को अच्छे संस्कार देने का ठान लें तो कुछ भी मुश्किल नहीं। बच्चों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी जाना भी जरूरी है। वह दिन दूर नहीं है जब हमारे बच्चे, एक श्रेष्ठ मानव के साथ-साथ एक श्रेष्ठ पंडित ,ज्योतिषी तो बनेंगे ही साथ ही एक अच्छा डॉक्टर, इंजीनियर, वकील,प्रोफेसर ,उद्योगपति ,एक अच्छा किसान ,सभी में इन्हें महारत हासिल होगी। । -डॉ सत्यवान सौरभ बालमन… कुम्हार की उस कच्ची मिट्टी की तरह होता है, जिसे आप, जैसा बनाना चाहे, वह वैसा ही बन जाएगी। उसी प्रकार, हम बच्चों के मन में, जैसे संस्कार, जैसे विचार डालेंगे, बच्चे भी वैसा ही रूप ले लेंगे। जिस तरह कुम्हार गीली मिट्टी को अपनी कला से एक आकार देकर किसी उपयोगी पात्र में बदल देता है, उसी तरह बालक भी एक गीली मिट्टी के समान होता है, जिसे उसके आसपास का वातावरण रूपी कुम्हार सही आकार देकर एक उचित्र पात्र में बदल देता है। इसीलिए बालक के आसपास का वातावरण कैसा भी हो उसके विकास का उस पर गहरा प्रभाव पड़ता है। और वह दिन दूर नहीं है जब हमारे बच्चे, एक श्रेष्ठ मानव के साथ-साथ एक श्रेष्ठ पंडित ,ज्योतिषी तो बनेंगे ही साथ ही एक अच्छा डॉक्टर, इंजीनियर वकील, प्रोफेसर, उद्योगपति, एक अच्छा किसान, सभी में इन्हें महारत हासिल होगी। बच्चों को जैसी परवरिश और शिक्षा देना चाहते हैं। वैसा ही आचरण माता-पिता को रखना चाहिए। बच्चे जो देखते-सुनते हैं वही उनके स्वभाव में आता है। इसलिए बच्चों के सामने जो भी कहें वो हमेशा सोच-समझकर कहें। जो आप कर रहे हैं, कह रहे हैं, उसे करने से बच्चों को यह कह कर नहीं रोक सकते कि ‘हम बड़े हैं, तुम बच्चे हो।’ यह अपने आप में एक और ग़लत धारणा बच्चों के मन में बैठाने की बात होगी क्योंकि जो नैतिक रूप से ग़लत है, वो हर उम्र के इंसान के लिए ग़लत है। किसी व्यक्ति की समाज के प्रति राय उसके बचपन से तय होती है। इसलिए जरूरी है कि माता-पिता, घर के बड़े लोग बच्चों के सामने अच्छा व्यवहार करें। बच्चे हैं तो गलतियां करेंगे ही, लेकिन छोटी-छोटी गलतियों को नजरअंदाज करना चाहिए। बच्चों के सामने गाली-गलौच न करें। ऐसी भाषा बोलें जो आप उनसे सुनना चाहते हैं। बच्चे अपनी किसी भी उपलब्धि पर तारीफ सुनना चाहते हैं। आखिर घर वाले तारीफ नहीं करेंगे तो कौन करेगा। इसलिए उनकी तारीफ करें और हौसला भी बढ़ाएं। किसी अच्छे काम पर खूब शाबाशी दें। यही नहीं अक्सर माता-पिता भूल जाते हैं कि बच्चे अपमान को बहुत जल्दी महसूस करते हैं, इसलिए उनका अपमान न करें। न ही एक-दूसरे का अपमान करें। बच्चों को जैसा बनाना चाहते हैं उनके सामने वैसा ही आचरण करें। शोध के ये निष्कर्ष बहुत महत्वपूर्ण हैं। न केवल माता-पिता बल्कि सभी बड़ों को इनसे सीखना चाहिए। अपने आसपास के बच्चों पर नजर डालें। पार्क में खेलते बच्चों को देखें। या स्कूल बस में चढ़ते बच्चों पर ध्यान दें। इनमें से बहुत से बच्चे ऐसे मिलेंगे जो किसी से मिलना-जुलना, बातें करना, साथ खेलना पसंद नहीं करते हैं। वे किसी की मदद करना भी नहीं चाहते। जबकि बहुत से बच्चे ऐसे होते हैं जिनका रवैया दोस्ताना होता है। वे हमेशा दूसरों की मदद करने को आतुर रहते हैं। अक्सर हम सोचते हैं कि ऐसा क्यों है। हाल ही में इंटरनैशनल जर्नल ऑफ बिहेवियर में ऐसी बातें छपी हैं जिनसे इन बच्चों के मन को समझा जा सकता है। इसमें बताया गया है कि जिन बच्चों को माता-पिता का प्यार और देखभाल मिलती है, जिनके रिश्ते अपने माता-पिता से बहुत लगाव के होते हैं, वे हमेशा दूसरों की मदद करने में आगे रहते हैं। इनके मुकाबले जिनका बचपन कठिनाइयों, अभाव, मुश्किलों और तनाव से गुजरता है, उनमें दया, उदारता, सहानुभूति जैसे मानवीय गुण कम मिलते हैं। तीन साल तक के जो बच्चे अपने माता-पिता के बहुत निकट होते हैं, उन्हें किशोरावस्था में भी मानसिक समस्याएं कम होती हैं। अच्छी बात यह है, हालांकि परवरिश काफी कठिन काम है, यह बहुत फायदेमंद भी है। बुरा हिस्सा है कि बहुत कड़ी और लंबी मेहनत के बार अच्छी परवरिश रंग लाती है जोकि किसी पुरस्कार की तरह होती है। लेकिन अगर हम शुरू से ही अपनी पूरी मेहनत से इसमें लगें तो हम अंततः पुरस्कार वापस पा लेंगे और अफसोस करने के लिए कुछ भी नहीं होगा। एक अच्छे माता-पिता होने का मतलब है कि आपको अपने बच्चे को नैतिकता सिखाने की ज़रूरत है कि क्या सही है और क्या गलत है। हर चीज की सीमा तय करना और अच्छी संगती होना अच्छे अनुशासन की कुंजी है। उन नियमों को लागू करते समय दयालु और दृढ़ रहें। बच्चे के हर व्यवहार के पीछे के कारण पर ध्यान दें। और बच्चे को पिछली गलतियों के लिए सजा देने की बजाय भविष्य के लिए सीखने का मौका दें।आजकल के बच्चों से कोई भी काम कराना हो फिर चाहे होमवर्क हो या अपने खिलौने समेटना। हर काम के लिए उन्हें चॉकलेट, खिलौने का लालच देना ही पड़ता है। शुरुआत में माता-पिता की तरफ़ से दिया लालच बच्चों के व्यवहार में शामिल हो जाता है। फिर वे ख़ुद ही हर बात पर बोलने लगते हैं मैं ये करूंगा/करूंगी तो मुझे क्या मिलेगा। ऐसे में आपको मजबूरन कोई न कोई जवाब देना ही पड़ेगा। इसलिए बच्चों को हर बात पर लालच न दें। अगर कुछ देना चाहते हैं तो काम करने के बाद दे सकते हैं, लेकिन हमेशा नहीं। बच्चों को इस तरह के व्यवहार की आदत न डलवाएं। घर से मेहमान जाने के बाद अकसर परिवार के सदस्य उस व्यक्ति को लेकर बातें करते हैं, तो कभी कमियां निकालते हैं। यही सब बच्चे भी देखते हैं और वे उस व्यक्ति के बारे में वैसी ही धारणा बना लेते हैं। बच्चों के मन पर इन सबका गहरा असर पड़ता है और वे भी बड़े होकर लोगों में कमियां ढूंढने लगते हैं। कई बार तो घर के सदस्य भी एक-दूसरे की पीठ पीछे बुराई करते नज़र आते हैं, ये बेशक सामान्य बातचीत जैसा हो लेकिन बच्चा बड़े ग़ौर से ये सब देखता-सुनता है। कई बच्चे तो सभी के सामने बोल भी देते हैं कि कौन किस व्यक्ति के बारे में क्या कह रहा था। इसलिए कभी किसी की पीठ पीछे उसकी कमियां न निकालें न ही बुराई करें। बच्चों के लिए आप आईना हैं या यू कहें कि बच्चे आपका आईना हैं। जैसे बड़े, वैसे बच्चे। बच्चे कच्ची मिट्टी के समान होते हैं। उन्हें जैसा आकार दो वे वैसा ढल जाते हैं। उनके मन में आर्थिक रूप से कमजोर या अन्य धर्म या जाति के विद्यार्थियों के लिए कोई भेदभाव नहीं होता। वे अपने आसपास के माहौल से ही सीखते हैं। जैसा व्यवहार उन्हें अपने आसपास मिलता है वे वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं। घर और स्कूल दोनों ही मिलकर बच्चों को अच्छे संस्कार देने का ठान लें तो कुछ भी मुश्किल नहीं। बच्चों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी जाना भी जरूरी है। इसलिए बाल मनोविशेषज्ञ कहते हैं कि जैसा आप अपने बच्चों को बनाना चाहते हैं, वैसे ख़ुद बनें। साथ ही यह भी जानना ज़रूरी है कि बच्चों के सामने कैसे ना बनें।

बच्चे मिट्टी के घड़े, अभिभावक कुम्हार। जैसा चाहो वो बने, दे दो जो आकार।। बालमन कच्ची मिट्टी के समान, जैसा आकार देंगे, वैसा बन जाएंगे। बच्चे कच्ची मिट्टी के समान होते हैं। उन्हें जैसा आकार…

आधुनिक समस्याओं से जूझता भारत कैसा विश्वगुरु?

भारत आगे का रास्ता दिखा सकता है। यह दुनिया के सबसे मजबूत लोकतंत्रों में से एक है, लेकिन हमारे लोगों की भागीदारी मतदान तक ही सीमित है। भारत अपने संस्थानों का…

कैबिनेट मंत्री डा. कमल गुप्ता ने गैर हाजिर रहने वाले अधिकारियों को नोटिस जारी करने के दिए आदेश

15 में से 12 शिकायतों का मौके पर किया समाधान, विधायक सुभाष सुधा ने 200 रजिस्ट्रियों के इंतकाल ना होने का उठाया मामला, पीएम का विजन लेकर घर-घर तक पहुंच…

वर्ष 1994 और 2014  में भी नहीं हो सका था  अम्बाला में उपचुनाव

कानूनन आवश्यक होने बावजूद वर्ष 2023 में नहीं कराया गया बीते 7  माह से रिक्त अम्बाला लोकसभा  सीट पर उपचुनाव अम्बाला  —   अंबाला  (अनुसूचित जाति आरक्षित) संसदीय अर्थात लोकसभा  सीट…

केयू में आयोजित 16वें राजीब गोयल युवा वैज्ञानिक पुरस्कार समारोह में जीव विज्ञान के क्षेत्र में अनुकरणीय योगदान के लिए प्रो. राजीव कुमार वार्ष्णेय को मिला राजीब गोयल पुरस्कार

वैज्ञानिकों का राष्ट्र निर्माण में अहम योगदान : प्रो. सोमनाथ सचदेवा कुरुक्षेत्र, 29 दिसम्बर। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कमेटी रूम में शुक्रवार को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति  व गोयल पुरस्कार समिति के…

*नया साल, नई उम्मीदें, नए सपने, नए लक्ष्य* 

नए साल पर अपनी आशाएँ रखना हमारे लिए बहुत अच्छी बात है, हमें यह भी समझने की ज़रूरत है कि आशाओं के साथ निराशाएँ भी आती हैं। जीवन द्वंद्व का…

अंबाला सहित प्रदेश की 9 नगर निगम एक गलती से बन गईं  नगर परिषद

कानूनन हर  जिला मुख्यालय की म्युनिसिपेलिटी है नगर परिषद बेशक जनसंख्या कितनी हो  — एडवोकेट नूंह नगरपालिका को नगर परिषद बनाने के लिए किए गए कानूनी संशोधन से हुई थी…

गृह एवं स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने प्रदेश के कोने-कोने से आए लोगों की समस्याओं को सुना

अम्बाला, 26 दिसम्बर हरियाणा के गृह एवं स्वास्थ्य मंत्री श्री अनिल विज ने मंगलवार को अपने आवास पर प्रदेश के कोने-कोने से आए लोगों की समस्याओं को सुना और सम्बधिंत…

सामाजिक अलगाव और आत्महत्या

आत्महत्या घरेलू हिंसा पर केंद्रित है। गरीबी, बेरोज़गारी, कर्ज़ और शैक्षणिक समस्याएँ भी आत्महत्या से जुड़ी हैं। भारत में किसानों की आत्महत्या की हालिया घटनाओं ने इस बढ़ती त्रासदी से…