करनाल, 12 जुलाई।   चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत विस्तार शिक्षा संस्थान नीलोखेड़ी में प्राकृतिक खेती के लिए विस्तार विधियां विषय पर चल रहे चार दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आज समापन हुआ। समापन समारोह की अध्यक्षता संस्थान के क्षेत्रीय निदेशक डा. संजय कुमार ने की।
क्षेत्रीय निदेशक डॉ संजय कुमार ने कहा कि केमिकल फॉर्मिंग से जमीन की उर्वरा क्षमता कम होती जा रही है और यह स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए बहुत नुकसानदायक है। प्राकृतिक खेती इस समस्या के समाधान के रूप में उभरी है। इसलिए हमें समय रहते इस पर विचार-विमर्श करना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती के चार स्तंभ जीवामृत, बीजामृत, वाफसा एवं मल्चिंग हैं। डॉ. कुमार ने बताया कि यह संस्थान वाईस-चांसलर प्रोफेसर बी. आर. कांबोज, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के नेतृत्व में उत्तर भारत के राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के कृषि, उद्यान, पशु-पालन, मत्स्य पालन, वानिकी, महिला एवं बाल विकास इत्यादि विभागों के विस्तार अधिकारियों को प्रशिक्षण देने का काम कर रहा है। उन्होंने वित्तीय सहयोग देने के लिए विस्तार निदेशालय, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार की सराहना की। उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलसचिव एवं विस्तार शिक्षा निदेशक डा. बलवान सिंह मंडल का भी धन्यवाद किया।

उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण के दौरान विस्तार अधिकारियों को राजकीय प्रशिक्षण संस्थान, प्राकृतिक खेती, कुरूक्षेत्र का भ्रमण करवाया गया, जहां पर पद्मश्री डॉ. हरिओम ने प्रतिभागियों को प्राकृतिक खेती के प्रभाव व क्षमता के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती में सूक्ष्म जीवों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। केमिकल फार्मिंग में कीटनाशकों इत्यादि के छिडक़ाव से ये सूक्ष्म जीव मर जाते हैं, जबकि ये सूक्ष्म जीव बहुत ही लाभदायक होते है। प्राकृतिक खेती में इन सूक्ष्म जीवों के माध्यम से पौधे को नाइट्रोजन, फॉसफोरस एवं जिंक इत्यादि पोषक तत्व सही मात्रा एवं अवस्था में मिलते हैं। इनसे मृदा की उर्वरा क्षमता भी बढ़ती है, इसके अतिरिक्त ये कृषि अवशेषों को गलाने में भी मदद करते हैं।
उन्होंने कहा कि फसल चक्र, मिश्रित फसल एवं इंटर क्रोपिंग इत्यादि विधियां भी प्राकृतिक खेती में महत्वपूर्ण होती हैं। कृषि लागत कम करने, किसानों की आमदनी बढ़ाने में भी प्राकृतिक खेती बहुत ही कारगर है। प्राकृतिक खेती में जो कुछ भी आदान लगते हैं वह किसान के घर में आसानी से मिल जाते हैं। गाय, गोबर, गौमूत्र, मिट्टी, नीम की पत्तियां, गड़ व बेसन ये सब किसान के घर में ही रहता है। इन्हीं से जीवामृत व बीजामृत तैयार होगा व प्राकृतिक खेती को बढ़ाया जा सकता है। प्राकृतिक खेती को छोटे खेत में शुरू करने के पश्चात जब अनुकूल अनुभव हो जाए तो धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए एवं पूर्णत: प्राकृतिक खेती को अपनाना चाहिए।
कार्यक्रम संयोजक डॉ. भरत सिंह घनघस ने कहा कि मनुष्य व पशुओं का स्वास्थ्य सीधे हमारी भूमि के स्वास्थ्य के साथ जुड़ा है। भूमि स्वस्थ है तो ही हम व हमारे पशु स्वस्थ रह सकते हैं। भूमि में यदि सभी लवण व आवश्यक तत्व मौजूद हैं तो तभी हमें भी सभी तत्वों वाले अनाज व फल-सब्जियां प्राप्त होंगे। जब भूमि में लवणों व अन्य तत्वों की कमी होती है, तब अनाज, फल व सब्जी भी कम पौष्टिक होते हैं। भूमि को प्राकृतिक तरीकों से स्वस्थ रखना आवश्यक है, तभी हम खाद्य सुरक्षा की बात कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि फल व सब्जियां हमारे भोजन का एक आवश्यक हिस्सा हैं, लेकिन आजकल फलों व सब्जियों में अत्यधिक रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है, जो भोजन के साथ हमारे शरीर में चले जाते हैं। यह रसायन हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होते हैं, इसलिए हमें जैविक तरीके से फल व सब्जियों का उत्पादन करना चाहिए व बगैर रसायनों के पैदा किए गए अनाज, फल व सब्जियां ही प्रयोग करने चाहिएं। इसके लिए प्राकृतिक खेती का तरीका सबसे सफल है।
डा. भरत सिंह ने विस्तार कृषि अधिकारियों को किसानों के उत्पादन की बिक्री में मदद करने का आह्वान किया। उन्होंने किसानों को समूह बनाकर उनके उत्पादों की बिक्री की सलाह दी। प्राकृतिक उत्पादों की मांग दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। उपभोक्ता अपने स्वास्थ्य को लेकर सचेत होते जा रहे हैं, इसलिए वे जहर मुक्त खाने की वस्तुएं लेना पसंद करते हैं। किसान उत्पादों को पंजीकरण व प्रमाणीकरण करवाने के लिए अपने क्षेत्र के कृषि अधिकारी या बागवानी अधिकारी से मिलकर सहायता प्राप्त कर सकते हैं। प्रशिक्षण के दौरान विस्तार अधिकारियों को मेहरा गांव के प्राकृतिक खेती करने वाले किसान राजकुमार आर्य के प्राकृतिक फार्म का भ्रमण भी करवाया गया जिसमें उन्होंने प्राकृतिक खेती के लिए आवश्यक सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की।
प्रशिक्षण संयोजक डा. भरत सिंह ने बताया कि प्रशिक्षण में हरियाणा, पंजाब, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर एवं उत्तर प्रदेश के विस्तार अधिकारियों ने हिस्सा लिया है। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण के दौरान विभिन्न संस्थानों से व्याख्यानों के लिए विशेषज्ञों को भी आमंत्रित किया गया था जिन्होंने प्रशिक्षण प्रबंधन एवं मानव संसाधन विकास संबधी व्याख्यान दिए। समापन कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए। इस दौरान संस्थान के सभी कर्मचारी एवं प्रतिभागी मौजूद रहे।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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