जब मेहनत हारने लगे और लीक संस्कृति जीतने लगे
– डॉ. प्रियंका सौरभ
देश में इन दिनों नीट परीक्षा को लेकर ऐसा माहौल बना हुआ है मानो कोई रहस्य-रोमांच से भरी वेब सीरीज़ रिलीज़ हुई हो। हर दिन नया खुलासा, नया किरदार और नई कहानी सामने आ रही है। कोई कह रहा है कि प्रश्नपत्र पहले से घूम रहा था, कोई दावा कर रहा है कि “गेस पेपर” में वही प्रश्न थे जो असली परीक्षा में आए। केवल प्रश्न ही नहीं, विकल्पों का क्रम, भाषा, यहाँ तक कि कॉमा और फुलस्टॉप तक समान बताए जा रहे हैं। अब विद्यार्थी और अभिभावक यही सोच रहे हैं कि यह “गेस” था या किसी अलौकिक शक्ति का चमत्कार?
यदि यह सब सच है, तो देश की जनता उन “गुरुजी” के दर्शन अवश्य करना चाहती है जिन्होंने यह करिश्मा किया। वर्षों से कोटा और सीकर के बड़े-बड़े कोचिंग संस्थान अरबों रुपये के ढाँचे खड़े करके सफलता का दावा करते रहे। हजारों शिक्षक दिन-रात पढ़ाते रहे। विद्यार्थी अपनी नींद, बचपन और मानसिक शांति तक दाँव पर लगाकर तैयारी करते रहे। लेकिन जो काम लाखों की फीस और वर्षों की मेहनत नहीं कर सकी, वह एक “गेस पेपर” ने कर दिखाया। यह शिक्षा व्यवस्था पर सबसे तीखा व्यंग्य है।
बताया जा रहा है कि जीव विज्ञान के 90 में से 90 प्रश्न और रसायन विज्ञान के 45 के 45 प्रश्न मेल खा गए। यदि ऐसा है, तो यह महज़ संयोग नहीं हो सकता। यह उन लाखों छात्रों की मेहनत का अपमान है जो ईमानदारी से पढ़ाई करते हैं। यह उस किसान पिता के संघर्ष का मज़ाक है जो खेत बेचकर बच्चे की फीस भरता है। यह उस माँ की उम्मीदों पर चोट है जो अपने सपनों को त्यागकर बच्चे के भविष्य के लिए जीती है।
नीट जैसी परीक्षा केवल एक एग्जाम नहीं होती, यह करोड़ों सपनों का दरवाज़ा होती है। यहाँ एक अंक जीवन की दिशा बदल देता है। ऐसे में यदि प्रश्नपत्र लीक होने या पहले से उपलब्ध होने की आशंका पैदा हो जाए, तो सबसे पहले भरोसा टूटता है। और जब शिक्षा व्यवस्था से भरोसा खत्म होने लगे, तब केवल परीक्षा नहीं, पूरा समाज संकट में आ जाता है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि मामला परीक्षा वाले दिन ही पुलिस तक पहुँच गया था। कुछ लोगों को उठाया भी गया, लेकिन अब तक एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई। यह चुप्पी अपने आप में सवाल है। क्या प्रभावशाली लोग घेरे में हैं? क्या शिक्षा अब इतना बड़ा कारोबार बन चुकी है कि सच सामने लाने से भी डर लगता है? या फिर यह वही पुरानी कहानी है जिसमें मेहनत से ज़्यादा कीमत पैसे और पहुँच की होती है?
आज मेहनती छात्र खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। उसने वर्षों तक किताबों में सिर खपाया, टेस्ट सीरीज़ दी, रात-रात भर जागकर पढ़ाई की। लेकिन कोई दूसरा व्यक्ति परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र का “दर्शन” कर गया। ऐसे में मेहनत का मूल्य क्या रह जाता है? छात्र के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि गलती उसकी थी या उसकी ईमानदारी की?
यह केवल परीक्षा में चीटिंग नहीं, बल्कि समाज की नैतिकता पर हमला है। जब युवाओं को यह दिखाई देने लगे कि सफलता का रास्ता परिश्रम नहीं बल्कि जुगाड़, नेटवर्क और लीक है, तब पूरी पीढ़ी का विश्वास टूटने लगता है। फिर किताबों से ज़्यादा भरोसा “व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी” पर होने लगता है।
सीकर और कोटा जैसे शहर आज शिक्षा से ज़्यादा “सेलेक्शन उद्योग” के प्रतीक बन चुके हैं। हर गली में कोचिंग संस्थान, हर मोड़ पर रैंक और रिज़ल्ट के होर्डिंग, हर दीवार पर “100% चयन” का दावा। ऐसा लगता है मानो हर मकान मालिक सुबह उठकर पहले “आईआईटी-नीट अकादमी” का बोर्ड लगाता है, फिर चाय पीता है। विद्यार्थी गाँवों से सपने लेकर आते हैं और माता-पिता कर्ज लेकर फीस भरते हैं। लेकिन अब इस पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है।
यदि प्रश्नपत्र पहले से घूम रहा था, तो यह पूरा तंत्र कितना ईमानदार है? क्या यह वास्तव में शिक्षा का केंद्र है या फिर सपनों का बाजार? यहाँ विद्यार्थी कम और “रिज़ल्ट प्रोडक्ट” ज़्यादा दिखाई देने लगे हैं। बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर छात्रों से ज़्यादा फोटो संस्थान के मालिकों की होती है, जबकि असली संघर्ष तो उस बच्चे का होता है जो कमरे में बंद होकर दिन-रात पढ़ता है।
सबसे दुखद स्थिति मध्यमवर्गीय और ग्रामीण परिवारों की है। माता-पिता अपनी जमा-पूँजी, खेत, गहने तक बेच देते हैं ताकि बच्चा डॉक्टर बन सके। बच्चे सामाजिक जीवन से कटकर केवल पढ़ाई में लगे रहते हैं। लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि किसी “गुरुजी” ने प्रश्नपत्र पहले ही बता दिया था, तो उनके भीतर व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास पैदा होता है।
आज व्यंग्य में लोग पूछ रहे हैं कि अगली बार किताबें खरीदें या सीधे “लीक विशेषज्ञों” से संपर्क करें? यह मज़ाक नहीं, हमारी शिक्षा व्यवस्था पर सबसे गंभीर आरोप है। यदि मेहनत और ईमानदारी हारने लगें, तो फिर समाज प्रतिभा का सम्मान करना भी छोड़ देता है।
हर बार सरकारें जाँच का आश्वासन देती हैं। कुछ गिरफ्तारियाँ होती हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस होती हैं, और फिर धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ जाता है। लेकिन जिस छात्र का एक साल बर्बाद होता है, उसके लिए यह केवल खबर नहीं, जीवन का संकट होता है। मानसिक दबाव, आर्थिक नुकसान और टूटे सपने किसी आँकड़े में दर्ज नहीं होते।
अब ज़रूरत केवल दोषियों को पकड़ने की नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और सुरक्षित बनाने की है। प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर वितरण तक हर स्तर पर जवाबदेही तय करनी होगी। परीक्षा माफिया और प्रभावशाली नेटवर्क पर कठोर कार्रवाई करनी होगी। वरना हर साल यही कहानी दोहराई जाएगी और हर बार लाखों नए छात्र व्यवस्था पर से भरोसा खो देंगे।
फिलहाल जनता की सबसे बड़ी जिज्ञासा यही है कि आखिर वे “गुरुजी” कौन हैं? वे कौन से सिद्ध पुरुष हैं जिनकी भविष्यवाणी कॉमा-फुलस्टॉप तक सच हो जाती है? क्या उन्होंने कोई तपस्या की थी, या फिर यह “ज्ञान” किसी और रास्ते से आया था? क्योंकि यदि गेस पेपर इतने ही सटीक होने लगे, तो शायद देश के विश्वविद्यालयों से ज़्यादा भीड़ “गुरुजी संस्थान” में दिखाई देगी।
व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन सच्चाई बेहद गंभीर है। यह केवल एक परीक्षा का संकट नहीं, बल्कि भरोसे का संकट है। और जिस दिन मेहनती युवा यह मान ले कि सफलता का रास्ता ज्ञान नहीं, जुगाड़ है—उस दिन समाज की नींव कमजोर होने लगती है। इसलिए अब समय केवल चर्चा का नहीं, निर्णायक सुधार का है। वरना आने वाली पीढ़ियाँ किताबों में नहीं, लीक हुए प्रश्नपत्रों में भविष्य तलाशेंगी।
