-डॉ. सत्यवान सौरभ
भारत में कोविड महामारी के बाद यदि कोई भय सबसे तेज़ी से समाज में फैला है, तो वह है—कोविड टीकों और हृदयाघात के बीच कथित संबंध। सोशल मीडिया पर वायरल संदेशों, अधूरी जानकारियों से भरे वीडियो, टीवी स्टूडियो की उत्तेजक बहसों और कुछ गैर-जिम्मेदार बयानों ने यह धारणा बना दी है कि कोविशील्ड या कोवैक्सिन जैसे टीकों के कारण युवाओं में अचानक हृदयाघात हो रहा है। यह डर इतना गहरा हो चुका है कि कई लोग टीकों को “धीमा ज़हर” तक कहने लगे हैं। लेकिन असली प्रश्न यह है—क्या यह भय वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है, या यह केवल अफ़वाहों और भ्रम की एक लंबी श्रृंखला है?
हाल के महीनों में कर्नाटक के हासन ज़िले में हुई 22 अचानक मौतों को कोविड टीकों से जोड़कर उठाए गए सवालों ने इस बहस को और हवा दी। इसके बाद सोशल मीडिया पर यह दावा तेज़ी से फैलने लगा कि “गलत इंजेक्शन” के कारण युवाओं की जान जा रही है। हालांकि, राज्य सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति ने विस्तृत जांच के बाद स्पष्ट निष्कर्ष दिया कि इन मौतों और कोविड टीकों के बीच कोई प्रत्यक्ष कारणात्मक संबंध नहीं पाया गया। यह निष्कर्ष किसी एक समिति तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की शीर्ष स्वास्थ्य संस्थाओं के अध्ययनों से भी इसकी पुष्टि होती है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर), केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा किए गए कई स्वतंत्र अध्ययनों में बार-बार यह बात सामने आई है कि भारत में उपयोग में लाए गए कोविड टीके सुरक्षित हैं। आईसीएमआर द्वारा 19 राज्यों के 47 बड़े अस्पतालों में किए गए एक बहु-केंद्र अध्ययन में अचानक हुई मौतों के कारणों का विश्लेषण किया गया। नतीजे स्पष्ट थे—लगभग 85 प्रतिशत मामलों में मृत्यु का कारण पहले से मौजूद हृदय धमनियों का रोग था, जिसमें धमनियों में वसा की परत (प्लाक) जमा हो चुकी थी। शेष मामलों में आनुवंशिक कारण, अस्वस्थ जीवनशैली, अत्यधिक मानसिक तनाव, मोटापा, धूम्रपान और कोविड संक्रमण के बाद के प्रभाव जिम्मेदार पाए गए। टीकों का कोई प्रत्यक्ष या निर्णायक संबंध सामने नहीं आया।
यह सच है कि एस्ट्राजेनेका कंपनी ने अदालत में यह स्वीकार किया कि उसके टीके से एक अत्यंत दुर्लभ स्थिति—रक्त का थक्का जमने और प्लेटलेट्स की कमी का लक्षण-समूह—हो सकता है। लेकिन यह स्थिति लाखों में कुछ गिने-चुने मामलों में देखी गई और वह भी टीका लगने के शुरुआती हफ्तों में। चिकित्सकीय दृष्टि से यह स्थिति और हृदयाघात दो अलग-अलग रोग प्रक्रियाएं हैं। इन दोनों को एक ही तराजू पर तौलना न केवल वैज्ञानिक रूप से गलत है, बल्कि जनता को गुमराह करने वाला भी है।
वास्तविकता यह है कि कोविड संक्रमण स्वयं हृदय के लिए कहीं अधिक घातक सिद्ध हुआ। विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सहित कई देशों में हुए अध्ययनों के अनुसार, कोविड से संक्रमित व्यक्ति में हृदयाघात, मस्तिष्काघात और हृदय विफलता का जोखिम दो से तीन गुना तक बढ़ गया था। यह वायरस शरीर में व्यापक सूजन उत्पन्न करता है, जो हृदय की मांसपेशियों और रक्त नलिकाओं को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। पहली और दूसरी लहर में ऐसे असंख्य मामले सामने आए, जहां अपेक्षाकृत युवा और पहले स्वस्थ दिखने वाले लोगों को भी गंभीर हृदय समस्याओं का सामना करना पड़ा। इस संदर्भ में टीकों ने जोखिम को कम करने में सुरक्षा कवच की भूमिका निभाई।
फिर यह सवाल उठता है कि महामारी के बाद अचानक मौतों और हृदयाघात की घटनाएं क्यों बढ़ती दिखाई दे रही हैं? विशेषज्ञों का उत्तर अपेक्षाकृत स्पष्ट है—महामारी के बाद की बदली हुई जीवनशैली। लंबे लॉकडाउन के दौरान शारीरिक गतिविधि में भारी कमी आई, वजन बढ़ा, मानसिक तनाव और अवसाद बढ़े, नींद का चक्र बिगड़ा और जंक फूड की खपत में वृद्धि हुई। इसके अलावा, कोविड संक्रमण के बाद लंबे समय तक बनी रहने वाली सूजन, थकान और सांस संबंधी समस्याएं भी हृदय जोखिम को बढ़ाती हैं। इन जटिल और वास्तविक कारणों पर गंभीर चर्चा करने के बजाय सारा दोष टीकों पर मढ़ देना आसान है, लेकिन यह वैज्ञानिक सच्चाई से कोसों दूर है।
यह बहस केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकतंत्र और सामाजिक जिम्मेदारी से भी गहराई से जुड़ी है। जब अफ़वाहें फैलती हैं, तो टीकाकरण के प्रति हिचकिचाहट बढ़ती है। भविष्य में यदि किसी नई महामारी का सामना करना पड़ा और लोग टीकों पर भरोसा नहीं करेंगे, तो उसके परिणाम कहीं अधिक घातक हो सकते हैं। इतिहास गवाह है कि पोलियो, चेचक और खसरा जैसी बीमारियों से मानवता की लड़ाई में टीकों ने निर्णायक भूमिका निभाई है। कोविड टीके भी उसी वैज्ञानिक परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
दुर्भाग्यवश, कुछ मीडिया मंचों और सोशल मीडिया के प्रभावशाली चेहरों ने टीआरपी और लोकप्रियता के लिए “टीका जानलेवा है” जैसे शब्दों का लापरवाही से प्रयोग किया। आधे-अधूरे तथ्यों को सनसनीखेज ढंग से पेश किया गया, जबकि पूरी वैज्ञानिक रिपोर्ट शायद ही कभी चर्चा में आई। नतीजा यह हुआ कि डर ने तर्क पर और अफ़वाह ने विज्ञान पर बढ़त बना ली।
सरकार और स्वास्थ्य संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे इस भ्रम को सक्रिय रूप से दूर करें। एम्स और आईसीएमआर जैसी संस्थाओं के तथ्य-आधारित निष्कर्ष केवल वेबसाइटों या प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें गांव-गांव तक पहुंचाया जाए। आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित कर वैज्ञानिक जानकारी का सशक्त माध्यम बनाया जा सकता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां स्वास्थ्य साक्षरता कम है। राजनीतिक नेतृत्व को भी संयम बरतना होगा—बिना वैज्ञानिक आधार के दिए गए बयान जनविश्वास को कमजोर करते हैं और स्वास्थ्य नीतियों को नुकसान पहुंचाते हैं।
“टीके को उलटने” या “डिटॉक्स” जैसी मांगें पूरी तरह अवैज्ञानिक हैं। आधुनिक चिकित्सा में वर्षों बाद किसी टीके को निष्प्रभावी करने का कोई सिद्धांत मौजूद नहीं है। इसके बजाय आवश्यकता एक व्यापक हृदय स्वास्थ्य अभियान की है—नियमित प्रारंभिक जांच, रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल की निगरानी, संतुलित आहार, योग और नियमित व्यायाम को जनआंदोलन का रूप देना। हृदयाघात से बचाव का वास्तविक मार्ग यही है।
आज के डिजिटल युग में अफ़वाहें बिजली की गति से फैलती हैं, जबकि सत्य अपेक्षाकृत धीमी चाल से आगे बढ़ता है। फिर भी, दीर्घकाल में विज्ञान का मार्ग ही टिकाऊ साबित होता है। एम्स और आईसीएमआर के अध्ययनों का निष्कर्ष एक स्वर में यही कहता है—कोविड टीके सुरक्षित हैं और अचानक मौतों का उनसे कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। टीके मित्र हैं, शत्रु नहीं।
भारत ने कोविड जैसी अभूतपूर्व महामारी का सामना कर सामूहिक प्रयासों से विजय प्राप्त की है। अब अगली चुनौती अफ़वाहों, डर और साजिशी सिद्धांतों से निपटने की है। हृदयाघात रोकने का सबसे प्रभावी “टीका” जागरूकता है—वैज्ञानिक सोच, सही जानकारी और जिम्मेदार संवाद। टीकों को बदनाम कर हम न केवल विज्ञान का अपमान करते हैं, बल्कि अपने भविष्य के स्वास्थ्य को भी खतरे में डालते हैं। समय आ गया है कि हम डर नहीं, आंकड़ों पर भरोसा करें और मिथकों के बजाय चिकित्सा विज्ञान को अपनाएं।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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