8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष
आज भी शहरी और ग्रामीण वार्डो से निर्वाचित महिलाओं के पति बनते हैं उनके प्रतिनिधि
अम्बाला – प्रतिवर्ष 8 मार्च का दिन विश्व भर में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (इंटरनेशनल विमेंस डे) के रूप में मनाया जाता है. इस दिन देश में कई स्थानों पर विशेष समारोह आयोजित किये जाते है और महिला अधिकारों की रक्षा और उनके उत्थान एवं सशक्तिकरण के लिए नेताओं और अधिकारियों आदि द्वारा बड़े बड़े दावे और वादे किये जाते है.
बहरहाल, शहर के सेक्टर 7 निवासी हाई कोर्ट एडवोकेट और कानूनी विश्लेषक हेमंत कुमार (9416887788) ने बताया कि इस वर्ष 2026 में महिला दिवस पर संयुक्त राष्ट्र (यू.एन.) का थीम है– राइट्स, जस्टिस एंड एक्शन-
फॉर आल वीमेन एंड गर्ल्स – जो दुनिया भर में महिलाओं के लिए कानूनी समानता, न्याय और सशक्तिकरण के लिए तत्काल कार्रवाई पर जोर देती है.
हेमंत का मानना है कि कड़वी सच्चाई यह है कि भारत में महिलाओ की दशा बीते कुछ वर्षो में दयनीय से शोचनीय होती जा रही है. विगत समय में महिलाओं के विरुद्ध अपराधो में, ख़ास तौर पर यौन एवं लैंगिक अपराधो में, बेतहाशा वृद्धि हुई है. हालांकि इस सम्बन्ध में संसद एवं राज्यों की विधानसभाओ द्वारा सम्बंधित कानूनों को और कड़ा कर ऐसे अपराधों के दंड/सजा को सख्त किया गया है, परन्तु इसका जमीनी स्तर पर कोई ठोस असर नहीं हुआ है. विडम्बना यह है कि आज की महिला न ऑनलाइन न ऑफलाइन, न कार्यालय और शिक्षण संस्थाओ, न बाहर खुली सड़क पर और न ही घर की चारदीवारी के भीतर आदि कहीं भी पूर्णतया सुरक्षित नहीं है.
उन्होंने आगे बताया कि महिलाओं के सशक्तिकरण और उनके सर्वांगीण विकास के लिए उनमे सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता के साथ ही राजनीतिक जागरूकता भी लानी होगी जिसके लिए उनको राजनीतिक आरक्षण देना बनता है हालांकि इसके साथ साथ महिलाओं शासन-विधि में पर्याप्त प्रशिक्षण देना भी अत्यंत आवश्यक है ताकि वह अपने पति या अन्य पर निर्भरता के बिना एवं उनके अनावश्यक दखल के बगैर स्वयं अपने बल-बूते पर उस पद का निर्वहन कर सके जिस पर उनका निर्वाचन हुआ है.
हेमंत ने आगे बताया कि न तो हरियाणा नगरपालिका कानून, 1973 और न ही हरियाणा नगर निगम कानून, 1994 में ऐसा कोई प्रावधान है जिसके अनुसार नगर निकाय के पद (जैसे मेयर/सीनियर डिप्टी मेयर/डिप्टी मेयर/अध्यक्ष/उपाध्यक्ष पद) पर निर्वाचित महिला या यहाँ तक कि नगर निकाय के वार्ड में से सदस्य (पार्षद) के रूप में निर्वाचित महिला का आधिकारिक तौर पर कोई प्रतिनिधि बन सकता है फिर वो चाहे उसका पति, पुत्र, ससुर-पिता कोई भी हो. हालांकि इसके बावजूद आज भी अधिकांश नगर निकायों में निर्वाचित महिलाओं के पति सरेआम उनके प्रतिनिधि के तौर पर कार्य कर रहे हैं जोकि कानूनन सही नहीं है. ठीक ऐसा ही तीन स्तरों के पंचायती राज संस्थाओं ( ग्राम सभा/पंचायत समिति/जिला परिषद) के पदों पर निर्वाचित महिलाओं के मामले में भी है हालांकि हरियाणा पंचायती राज कानून, 1994 में भी किसी महिला पदाधिकारी के पति या रिश्तेदार आदि का उसका प्रतिनिधि बनने हेतु कोई प्रावधान नहीं है.
यह भी रोचक तथ्य है कि हालांकि वर्तमान में शहरी निकायों और पंचायती राज संस्थाओं के विभिन्न पदों पर निर्वाचित किसी भी पुरुष पदाधिकारी की पत्नी उसकी प्रतिनिधि नहीं है. अब जब पति अपनी पदाधिकारी पत्नी का प्रतिनिधि बन सकता है, तो इसी तर्ज पर पत्नी अपने पदाधिकारी पति की प्रतिनिधि क्यों नहीं बन सकती ? भारत देश, जो विश्व का सबसे बड़ा संसदीय लोकतंत्र है, में लिंग के आधार पर प्रतिनिधि बनने में भेदभाव नहीं किया जा सकता है.
जहाँ तक संसद और विधानसभाओ में एक-तिहाई महिला आरक्षण का विषय है, तो देश की स्वतंत्रता के 76 वर्ष बाद अढ़ाई वर्ष पूर्व सितम्बर, 2023 में मोदी सरकार द्वारा संसद मार्फ़त महिला आरक्षण विधेयक पारित कराया गया जिसे हालांकि नारी शक्ति वंदन अधिनियम का नाम दिया गया हालांकि वास्तव में यह संविधान ( 106 वां संशोधन) कानून, 2023 के नाम से अधिनियमित हुआ है. हालांकि धरातल पर उक्त महिला आरक्षण कानून लागू होने में अर्थात लोकसभा और प्रदेश विधानसभा में एक तिहाई अर्थात 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होने में कुछ वर्षों का समय लगेगा क्योंकि उपरोक्त कानून के प्रावधान अनुसार इसके लागू होने के बाद की गई पहली जनगणना के प्रासंगिक आंकड़े आने के बाद किए जाने वाले सीटों के परिसीमन के बाद ही इसका क्रियान्वयन हो सकेगा.
हेमंत ने आगे बताया कि आज तक भारतीय समाज में पारम्परिक पुरुष-प्रधान मानसिकता ही विद्यमान है. हालांकि जहाँ तक राज्यों में स्थापित नगर निकाय (नगर निगम/परिषद/पालिका) और पंचायती राज संस्थाओं में महिला आरक्षण को मौजूदा 33 % से बढ़ाकर 50 % करने का विषय है, जो वर्तमान संवैधानिक प्रावधानों में ऐसा करना संभव है, तो पिछले कुछ वर्षो में देश के डेढ़ दर्जन से ऊपर राज्यों, खासकर जहाँ जहाँ भाजपा की प्रदेश सरकारें रहीं, वहां ऐसा किया जा चुका है जिनमें गुजरात भी शामिल हैं जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए ऐसी 50% महिला आरक्षण व्यवस्था लागू करवाई थी. यहाँ तक कि वर्ष 2017 में पडोसी पंजाब में कांग्रेस की तत्कालीन कैप्टन अमरेन्द्र सिंह सरकार ने भी शहरी निकायों से संबंधित कानूनों में संशोधन कर इसे लागू कर दिया था. हालांकि हरियाणा की वर्तमान सरकार ने इस मुद्दे पर अभी तक पूर्ण गंभीरता नहीं दिखाई है.
हेमंत ने बताया कि जहाँ तक अम्बाला जिले का विषय है तो आगामी अंबाला शहर नगर निगम चुनाव में मेयर का पद पिछड़ा वर्ग ( बी.सी.) –(बी) वर्ग की महिला के लिए आरक्षित किया गया है. इसके अतिरिक्त निगम के कुल 20 वार्डों में से कुल 7 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे जिनमें चार वार्ड महिला (ओपन) वार्ड होंगे जबकि एक- एक वार्ड एस.सी.(महिला), बीसी(ए) – महिला और एक बीसी (बी)- महिला के लिए आरक्षित हैं. अम्बाला सदर (कैंट) नगर परिषद के अध्यक्ष पद पर एस.सी.(महिला) पदस्थ है. इसी प्रकार नारायणगढ़ नगरपालिका समिति के अध्यक्ष पद पर भी वर्तमान में महिला आसीन है. मौजूदा हरियाणा विधानसभा की कुल 13 महिला विधायकों में से दो अम्बाला जिले से ही हैं- नारायणगढ़ वि.स. हलके से शैली चौधरी और मुलाना वि.स. सीट से पूजा चौधरी.
