फसलों  के  प्राकृतिक रंग और गुणवत्ता ने मोहा मन, मटर और गोभी का चखा स्वाद

सोनिका वधवा

कुरुक्षेत्र।आधुनिक युग के ‘कृषिऋषि’ के नाम से देशभर में विख्यात राज्यपाल आचार्य श्री देवव्रत जी का प्राकृतिक कृषि मॉडल किसानों के साथ-साथ अब कृषि विशेषज्ञों को भी लुभा रहा है। पहले हिमाचल प्रदेश, फिर गुजरात और अब महाराष्ट्र में भी प्राकृतिक खेती को लेकर आचार्यश्री द्वारा चलायी मुहिम का असर साफ तौर पर देखा जा रहा है और लाखों की तादाद में किसान उनके मार्गदर्शन में आज प्राकृतिक को अपनाकर न केवल लोगों को पोषण से भरपूर शुद्ध खाद्यान्न उपलब्ध करा रहे हैं बल्कि आर्थिक रूप से भी मजबूत हुए हैं। आचार्यश्री की प्राकृतिक कृषि की ‘प्राथमिक प्रयोगशाला’ रहा गुरुकुल कुरुक्षेत्र का प्राकृतिक कृषि फार्म भी देशभर में प्रसिद्ध है और समय-समय पर यहां पर कृषि विशेषज्ञ अपनी जिज्ञासाओं को शान्त करने पहुंचते हैं, इसी कड़ी में महाराष्ट्र के चार प्रमुख कृषि विश्वविद्यालयों के कुलपति बुधवार को गुरुकुल पहुंचे और यहां पर चल रहे विभिन्न प्रकल्पों का बारीकी से अवलोकन किया।
गुरुकुल में पहुंचे प्रोफेसर संजय भावे, कुलपति डॉ. बालासाहेब सावंत कोंकण कृषि विवि, दापोली, प्रोफेसर इन्द्रमणि मिश्रा, कुलपति वसंतराव नाइक मराठवाडा कृषि विश्वविद्यालय, परभनी, डॉ. विलास खारचे, कुलपति महात्मा फूले कृषि विद्यापीठ, राहुरी और डॉ. शरद गडख, कुलपति, डॉ. पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ, अकोला का पदम्श्री डॉ. हरिओम एवं व्यवस्थापक रामनिवास आर्य ने सभी अतिथियों का जोरदार स्वागत किया। इनके साथ कई अन्य कृषि विशेषज्ञ भी प्राकृतिक खेती को जानने के लिए गुरुकुल पहुंचे।
गुरुकुल में इन सभी अतिथियों ने जीवामृत निर्माण केन्द्र, गुरुकुल की अत्याधुनिक गोशाला, देवयान विद्यालय भवन, एनडीए ब्लॉक, आर्ष महाविद्यालय आदि का भ्रमण किया। गोशाला में देशी नस्लों की गाय और गोमूत्र-गोबर का प्राकृतिक खेती हेतु प्रबंधन देख सभी अतिथि हैरान रह गये, उन्होंने एक स्वर में कहा कि गोमाता की उत्तम सेवा और गोबर-गोमूत्र का श्रेष्ठतम् उपयोग आचार्यश्री के मार्गदर्शन में गुरुकुल कुरुक्षेत्र द्वारा किया जा रहा है।
गुरुकुल के फार्म पर पहुंचे सभी कुलपति महोदयों ने वहां पर ड्रेगन फ्रूट, केला, चीकू, बेर, आम, लीची, स्ट्रॉवरी, सिंघाडा आदि की बागवानी, गेहूँ, धान, गन्ना व हरी सब्जियों की उन्नत खेती पर विस्तृत चर्चा की। यहां डॉ. हरिओम ने उन्हें गेहूँ और चना की मिश्रित फसल दिखाई और बताया कि इसमें पानी की 50फीसदी तक बचत होती है और उत्पादन भी पूरा मिलता है। फार्म पर बनाया ‘जंगल मॉडल’ भी अतिथियों को बहुत पसंद आया जिसमें वर्षभर अलग-अलग फलों का उत्पादन होता है। यहीं पर ‘फूलगोभी और मटर’ की मनभावनी और गुणवत्ता से लबरेज फसलों को देख कुलपति महोदय ललचाए बिना नहीं रह सके और उन्होंने गोभी के फूल को तोड़कर इसका स्वाद चखा, इसी प्रकार मटर की फलियां भी खायीं। उन्होंने कहा कि आमतौर पर वे सलाद ने खाते क्योंकि बाहर सलाद वाली फसलों में बहुत अधिक मात्रा में केमिकल, कीटनाशक डाला जाता है मगर गुरुकुल की सब्जियों को देखकर व्यक्ति के मुंह में पानी आ जाता है। कुल मिलाकर गुरुकुल के फार्म पर हो रही प्राकृतिक खेती को देखकर सभी अतिथि अभिभूत नजर आए और प्राकृतिक खेती को लेकर उनके मन में चल रही सभी शकाएं यहां आकर दूर हो गयीं। उन्होंने कहा कि वाकई में आचार्यश्री का प्राकृतिक कृषि मॉडल किसानों के लिए वरदान सिद्ध होगा, अधिक से अधिक किसानों को प्राकृतिक खेती अपनानी चाहिए और महाराष्ट्र में वे इसके लिए भरसक प्रयास करेंगे।
गुरुकुल की ओर से पद्मश्री डॉ. हरिओम एवं रामनिवास आर्य ने सभी अतिथियों को ‘प्राकृतिक उत्पाद’ भेंट किया और गुरुकुल पहुंचने पर आभार जताया।

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