गुरु-शिष्य परंपरा की मिसाल: श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय में तीन पीढ़ियां साथ
कुरुक्षेत्र। शिक्षक दिवस पर अक्सर हम उन गुरुओं को याद करते हैं,जिन्होंने हमें सही राह दिखाई। लेकिन ऐसा बहुत कम होता है,जिस संस्थान में हम सेवाएं दे रहे होते हैं, वहीं हमारा गुरु हो,लेकिन श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में एक ऐसी मिसाल देखने को मिली है, जो सिर्फ शिक्षा ही नहीं बल्कि सच्ची गुरु-शिष्य परंपरा की झलक पेश करती है। यहां शल्यतंत्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. राजेंद्र सिंह चौधरी और रचना शरीर विभाग के अध्यक्ष प्रो.सतीश वत्स ने न सिर्फ अपने विद्यार्थियों को आयुर्वेद शिक्षा दी, बल्कि उनके शिष्य और उनके शिष्यों की अगली पीढ़ी भी आज शिक्षक बनकर उसी विश्वविद्यालय में सेवाएं दे रही है। शिक्षा जगत में एक ही विश्वविद्यालय में तीन पीढ़ियों के गुरु-शिष्य का साथ होना किसी अनोखी मिसाल से कम नहीं है।
तीन-तीन पीढ़ी दे रही शिक्षा
साल 2000 में कुरुक्षेत्र स्थित श्री कृष्ण राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज में बतौर सहायक प्रोफेसर नियुक्त हुए प्रो. चौधरी ने अपने करियर में कई छात्रों को शिक्षा दी। आज उनके पढ़ाए हुए छात्र ही नहीं, बल्कि उनके छात्रों के छात्र भी विश्वविद्यालय में बतौर शिक्षक सेवाएं दे रहे हैं।
उनके पढ़ाए हुए शिक्षकों में प्रो. रविंद्र अरोड़ा, प्रो. कृष्ण कुमार, प्रो. मनोज कुमार, प्रो. सुनीति तंवर और प्रो. रवि राज शामिल हैं। इसके बाद दूसरी पीढ़ी के रूप में एसोसिएट प्रो. अनामिका और एसोसिएट प्रो. सुधीर मलिक ने भी उनसे शिक्षा ली। अब तीसरी पीढ़ी में सहायक प्रोफेसर डॉ. पुनीता शर्मा और डॉ. रूचिका भोला उनकी शिष्य परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। आज एक ही विश्वविद्यालय में तीन पीढ़ियों के गुरु-शिष्य विभिन्न विभागों में कार्यरत हैं। यह केवल शिक्षण का उदाहरण नहीं, बल्कि एक ऐसी गुरु-शिष्य परंपरा की अनोखी मिसाल है, जो विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
गुरु-शिष्य की डोर पीढ़ी दर पीढ़ी शिक्षा का प्रकाश फैलाती है
इस मौके पर कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान ने कहा कि शिक्षक की असली पहचान उसके ज्ञान और चरित्र से होती है। प्रो. राजेंद्र चौधरी व प्रो. सतीश वत्स का यह योगदान इस बात का प्रमाण है कि सच्चा शिक्षक न केवल ज्ञान बांटता है,बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी शिक्षक बनने के लिए प्रेरित करता है। वहीं, प्रो. राजेंद्र सिंह चौधरी ने कहा कि किसी भी शिक्षक के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यही होती है कि उसके शिष्य आगे बढ़कर समाज और शिक्षा जगत की सेवा करें। मैं गर्व महसूस करता हूं कि मेरे पढ़ाए हुए छात्र अब खुद शिक्षक बनकर इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। यह गुरु-शिष्य की डोर ही है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी शिक्षा का प्रकाश फैलाती है।
