पंचकूला। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोपी व्यक्ति को जमानत देते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि आरोपी स्वयं वंचित अनुसूचित जाति समुदाय से है, इसलिए यह संदिग्ध है कि क्या अधिनियम के प्रविधान दी गई परिस्थितियों में लागू होंगे।

जस्टिस मनीषा बत्रा ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने के 425 दिनों के अंतराल के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया। एफआईआर की सामग्री के अवलोकन से पता चलता है कि पीडि़त को उसकी जाति के नाम से पुकारे जाने का आरोप विशेष रूप से उससे संबंधित नहीं है।

जातिसूचक नाम से पुकारे जाने पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, हाई कोर्ट ने दी जमानत; कहा-

वैसे भी, वह वंचित अनुसूचित जाति श्रेणी में आते हैं और इस तरह, यह विचार किया जाना चाहिए कि क्या एससी/एसटी अधिनियम के प्रावधान उनके खिलाफ लागू होते हैं या नहीं?

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 14-ए (2) के तहत नियमित जमानत की मांग करते हुए याचिका दायर की गई थी।

आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता ने सह-आरोपियों के साथ मिलकर शिकायतकर्ता पर हमला किया तथा उसे उसकी जाति के नाम पर बुलाया और उसका अपमान करते हुए कहा कि वे निश्चित रूप से उसे मार डालेंगे।

अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि वह स्वयं अनुसूचित जाति समुदाय से है। इसलिए, एससी/एसटी अधिनियम के प्रावधान उसके विरुद्ध लागू नहीं होते, लेकिन निचली अदालत ने याचिका खारिज करते समय इस तथ्य पर भी विचार नहीं किया।

प्रस्तुतियां सुनने के बाद, न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता खटीक जाति से संबंधित है जिसे हरियाणा सरकार द्वारा वंचित अनुसूचित जाति घोषित किया गया है।

इसमें कहा गया है कि अपीलकर्ता पांच जून 2025 से हिरासत में है। उसे कोई विशेष चोट नहीं लगी है। न ही घटना के समय उसके पास कोई विशेष हथियार होने का आरोप है। परिणामस्वरूप, याचिका स्वीकार कर ली गई।

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