बार रूम में लेडी लॉयर्स, नए वकीलों और लॉ स्टूडेंट्स की राज्य स्तरीय कनवेंशन सम्पन्न
कुरुक्षेत्र। आल इंडिया लॉयर्स यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व एडवोकेट जनरल बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने कहा कि बिना न्यायपालिका की स्वन्त्रता और जवाबदेही के लोकतन्त्र व संविधान सुरक्षित नहीं हो सकता। न्याय पालिका की स्वतंत्रता, संविधान और लोकतंत्र बचाओ विषय पर वे शनिवार को कुरुक्षेत्र बार रूम में लेडी लॉयर्स, नए वकीलों और लॉ स्टूडेंट्स की राज्य स्तरीय कनवेंशन में बतौर मुख्य अतिथि विचार व्यक्त कर रहे थे। सेमिनार की अध्यक्षता एआईएलयू के राज्य अध्यक्ष गुरमेज़ सिंह व ज़िला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष धर्मेन्द्र अत्री ने संयुक्त रूप में की। मंच का संचालन कुरुक्षेत्र यूनिट के अध्यक्ष प्राशीश ने किया। भट्टाचार्य ने कहा कि हमारे देश को ब्रिटिशर्स से आज़ाद कराने के लिए लाखों-लाख देशभगतों ने क़ुर्बानी दी। शहीद भगत सिंह जैसे अनेक क्रांतिकारियों व आज़ादी के दीवानों ने सपने संजोए थे कि एक ऐसा देश बने, जिसमें सभी को शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य आदि मूलभूत सुविधाएं मिले, कोई भी भूखा व बिना छत के न सोए। विशेष तौर पर क्रांतिकारी समतामूल्क समाज की कल्पना करते थे, लेकिन आज़ादी के 77 वर्ष बाद आज भी असमानता घटने की बजाए बढ़ी है। आजादी के आंदोलन को कमजोर करने के लिए एक तरफ़ मुस्लिम लीग, दूसरी तरफ़ हिंदू महासभा आरएसएस दो देश बनाने की बात करती थी, जबकि आज़ादी के आंदोलन की शाक्तियां देश में संवैधानिक सता चाहती थी, जिसमें मज़बूत लोकतंत्र हो, जो समता, और स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर आधारित है, जिसमे सभी को न्याय, बराबरी, लोकतन्त्र, धर्म निरपेक्षता और समाजवाद हो। हमें एक ऐसा देश यहां आर्थिक व सामाजिक न्याय हो। उन्होंने कहा कि हमारा संविधान मौलिक अधिकारों की बात करता है, जिसको सिर्फ़ स्वतंत्र और जवाबदेह न्यायपालिका ही सुरक्षित कर सकती है। मगर न्यायपालिका को अंदर व बाहर से ख़तरा बना हुआ है, न्यायपालिका को संविधान ने शक्तियां दी है कि वह सरकार, कार्यपालिका, पुलिस अन्य संस्थाओं को तानाशाह बनने से रोकती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में केन्द्र सरकार संविधान पर लगातार एक के बाद एक हमले कर रही है। संवैधानिक संस्थाएं व केंद्रीय एजेंसियाँ सरकार के इशारों पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि क़ानून बना कर केंद्र सरकार ने चुनाव आयोग के मुख्य व अन्य आयुक्तों की नियुक्ति की सारी शक्ति अपने हाथ में ले ली, न्यायपालिका जो नियुक्ति प्रक्रिया का हिस्सा थी, उसको बाहर कर दिया। जो लोकतंत्र के लिए गंभीर ख़तरा बन गया, चुनाव आयोग का व्यवहार अलोकतांत्रिक व ग़ैर पारदर्शी हो गया है। सुप्रीम कोर्ट मामले पर सुनवाई नहीं कर रहा, जबकि ये एक गंभीर विषय है।
आल इंडिया लॉयर्स यूनियन के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष अनिल चौहान ने कहा कि महिला वकीलों को दोहरी चुनौतियों का सामना करनाल पड़ता है। एक तो क़ानून व्यवसाय की सामान्य चुनौतियां दूसरी तरफ महिला होने के नाते सामना करना पड़ता है। महिलाओं को एसोसिएशन्स व कौंसिलों में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलता, जिसके लिये उन्हें आरक्षण देना होगा। मातृत्व के दो अवकाश के रूप में पांच-पांच लाख रुपये महिला वकीलों को देने की व्यवस्था हो। क़ानून के छात्रों को व्यवस्थित ढांचागत सुविधाओं का भारी अभाव है। नये वकीलों को प्रति महीना पांच वर्ष तक दस हज़ार रुपये दिए जाए। महिला वकीलों की रिपोर्ट मुकेश मान व छात्र रिपोर्ट अंकिता ने रखी
इस मौक़े पर सात-सात सदस्यीय महिला व छात्र सब कमेटी चुनी गई। इस मौक़े पर राज्य सचिव कुलदीप सिंह राणा, राजविंदर सिंह चंदी, चंद्रभान, कमलेश, चांदी राम पातड़, मुकेश मान, कमलेश, सोमदत, रणधीर साथी सचिव मंडल के सदस्य मौजूद रहे।

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