नई दिल्ली। वित्त आयोग के पूर्व चेयरमैन एनके ¨सह और अन्य विशेषज्ञों ने बुधवार को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के समक्ष ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ (ओएनओई) के आर्थिक पहलुओं पर चर्चा की
एक साथ चुनाव से 4.50 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि संभव
उन्होंने कहा कि इससे वास्तविक जीडीपी में 1.5 प्रतिशत यानी करीब 4.50 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि संभव है। साथ ही पूंजीगत व्यय और निवेश गतिविधियों में भी बढ़ोतरी हो सकती है।
विशेषज्ञों ने 2023-24 के आंकड़ों के संदर्भ में जीडीपी में 4.50 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि का अनुमान व्यक्त किया। हालांकि, चुनावों के बाद खर्च बढ़ने से राजकोषीय घाटा 1.3 प्रतिशत अंक बढ़ने की संभावना भी जताई गई।
1967 तक देश में एक साथ चुनाव होते थे
पूर्व राजस्व सचिव एनके सिंह और अशोका यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर प्राची मिश्रा ने बताया कि 1967 तक देश में एक साथ चुनाव होते थे, लेकिन उसके बाद से लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग-अलग होने लगे थे।
मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, पर्यटन और स्वास्थ्य सेवाओं में गिरावट आती है
विशेषज्ञों ने कहा कि बार-बार चुनावों के कारण अनिश्चितता की स्थिति पैदा होती है और इससे आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, पर्यटन और स्वास्थ्य सेवाओं में गिरावट आती है। प्रवासी श्रमिकों को बार-बार अपने मूल स्थान पर लौटना पड़ता है और इससे उत्पादकता पर असर पड़ता है।
स्कूलों को मतदान केंद्रों में बदलना होता है
उन्होंने उल्लेख किया कि प्रवासी, भारत की आबादी का लगभग एक तिहाई हिस्सा हैं तथा बार-बार चुनाव कराने से उन पर भी वित्तीय बोझ पड़ता है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को चुनावी ड्यूटी पर तैनात करने और स्कूलों को मतदान केंद्रों में परिवर्तित करने के कारण स्कूल नामांकन में भी 0.5 प्रतिशत की कमी आती है।
देश लगातार चुनावी माहौल में रहता है
उन्होंने तर्क दिया कि पुलिसकर्मियों को बार-बार चुनावी कार्यों में लगाए जाने के चलते चुनावों के दौरान आपराधिक घटनाएं बढ़ जाती हैं। वर्ष 1986 के बाद से भारत में एक भी साल ऐसा नहीं रहा, जब चुनाव नहीं हुए हों और इस कारण देश लगातार चुनावी माहौल में रहा। उन्होंने कहा कि लगातार चुनाव अस्थायी कल्याणकारी योजनाओं को बढ़ावा देते हैं, जिससे लोकलुभावन वादों में वृद्धि होती है।
