संस्कृति और संस्कार हमारे जीवन के आभूषण हैं : डाॅ. ममता सचदेवा
तीन दिवसीय अखिल भारतीय कार्यशाला हुआ समापन

कुरुक्षेत्र, 28 जुलाई। विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान में तीन दिवसीय अखिल भारतीय कार्यशाला का आज समापन हुआ। मंचासीन विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के संगठन मंत्री गोविंद चंद्र महंत, संस्थान की अध्यक्षा डाॅ. ममता सचदेवा, निदेशक डाॅ. रामेन्द्र सिंह सं.बो.प. के संयोजक दुर्ग सिंह राजपुरोहित रहे। इस अवसर पर कोषाध्यक्ष वीरेन्द्र वालिया एवं सहसचिव डाॅ. पंकज शर्मा भी उपस्थित थे। डाॅ. रामेन्द्र सिंह ने मंचासीन अतिथियों का परिचय कराते हुए सभी का स्वागत किया। गोविंद चंद्र महंत ने भारतीय संस्कृति का महत्व समझाते हुए कहा कि आज संस्कृति के पुनस्र्थापन एवं पुनर्जागरण की अत्यंत आवश्यकता है। संस्कृति ज्ञान को रुचि का विषय बनाना है। इसे मन और बुद्धि में भी लाना है। उन्होंने कहा कि अपनी संस्कृति का प्रचार होना चाहिए अन्यथा अपसंस्कृति आ जाएगी और हमारी संस्कृति को खराब करेगी। इसके लिए सांस्कृतिक धरोहर को भी आगे लाना होगा। उन्होंने नेपाल का उदाहरण देते हुए कहा कि छोटा सा देश होते हुए भी वहां संस्कृति ज्ञान परीक्षा चलती है और लोग इसका इंतजार करते हैं। यह देश भारतीय संस्कृति के प्रति बेहद सजग है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी कहा गया है कि भारतीय शिक्षा में संस्कृति मूल होनी चाहिए। शिक्षकों को गणित अथवा साइंस जैसे विषय पढ़ाते समय भी सोचना होगा कि उसमें संस्कृति को कैसे पिरोया जा सकता है।
अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए डाॅ. ममता सचदेवा ने विद्या भारती के लक्ष्य को इंगित किया। हमारा लक्ष्य छात्र-छात्राओं का बौद्धिक, शारीरिक, भावनात्मक एवं नैतिक विकास हो ताकि वे जिम्मेदार एवं आत्मविश्वास से परिपूर्ण इंसान बन सकें। हमें ऐसी शिक्षा प्रणाली को विकसित करना है जिसके द्वारा हिन्दुत्वनिष्ठ एवं राष्ट्रभक्ति की भावना से ओतप्रोत कर सके। भारतीय संस्कृति दुनिया की सर्वश्रेष्ठ संस्कृतियों में से है। यही कारण है कि आज पूरी दुनिया भारत की ओर दृष्टि लगाए है। ऐसे में प्रत्येक नागरिक को भारत के गौरवशाली संस्कृति का बोध ठीक से हो, इस निमित्त संस्कृति बोध परियोजना का आयाम विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान द्वारा पूरे देश में चलाया गया है। उन्होंने कहा कि ज्ञान के साथ-साथ संस्कार भी हों तभी शिक्षा सार्थक होती है। यह ज्ञान केवल परीक्षा तक ही सीमित न रहे, इसे जीवन व्यवहार में भी लाना होगा। संस्कृति और संस्कार हमारे जीवन के आभूषण हैं।
इससे पूर्व के सत्र में डाॅ. रामेन्द्र सिंह ने बताया कि वर्ष 1980 से शुरू हुई संस्कृति ज्ञान परीक्षा में आज 22 लाख छात्र-छात्राएं प्रतिवर्ष प्रतिभागिता कर संस्कृति के वाहक बन रहे हैं। हिन्दी भाषा में शुरू हुई यह परीक्षा आज देश के अलग-अलग राज्यों में 12 भाषाओं में आयोजित हो रही है। संस्कृति ज्ञान के महाअभियान का उद्देश्य है कि इस देश में संस्कृति बोध की भावना कैसे प्रत्येक नागरिक के हृदय में समाहित हो। इसी दृष्टि से छात्र एवं आचार्य संस्कृति ज्ञान परीक्षा, संस्कृति महोत्सव में प्रश्न मंच, आशु भाषण, मूर्ति कला प्रतियोगिता, लोकनृत्य अर्थात् संस्कृति के सभी आयाम इन विधाओं से परिलक्षित होते हैं। संस्कृति का अर्थ ही है सम्यक् कृति। मंच संचालन श्री सुधीर कुमार ने किया। सं.बो.प. संयोजक दुर्ग सिंह राजपुरोहित ने आभार अभिव्यक्ति दी। कार्यशाला में संस्कृति ज्ञान परीक्षा प्रश्न पत्र एवं प्रश्न मंच हेतु प्रश्न संच निर्माण कार्य पूर्ण किया। प्रतिभागियों ने कार्यशाला में अपने अनुभव साझा किए एवं महत्वपूर्ण भी सुझाव दिए।

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