-शौर्य की मिट्टी से तिलक, आंखों में गर्व और दिलों में राष्ट्र प्रेम
-कारगिल युद्ध के रणबांकुरे के शौर्य की गाथा आंखें हुई नम
-श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय में शौर्य सम्मान दिवस आयोजित
कुरुक्षेत्र,26 जुलाई। “सूरा सो पहचानिए जो लरे दीन के हेत, पुरजा-पुरजा कट मरे कबहू न छाड़े खेत”-यह शब्द उस वीरता का प्रतीक हैं, जो भारत माता की रक्षा में अपने कर्तव्य से कभी पीछे नहीं हटे। श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय में कारगिल विजय दिवस-2025 के उपलक्ष्य में आयोजित शौर्य सम्मान दिवस कार्यक्रम में यह पंक्तियां संजीव हो उठीं।
कार्यक्रम की शुरुआत भारत माता की जय और वंदे मातरम् के जयकारों से हुई। मंच पर उपस्थित अतिथियों और वीर सैनिकों को वीर बलिदानी संजीव कुमार (कौलापुर), सुशील कुमार, मंगतराम और मनदीप सिंह के गांवों से लाई गई मिट्टी से तिलक किया गया। यह तिलक मात्र परंपरा नहीं, एक संकल्प था-उस शौर्य को स्मरण करने का, जो हमारे वीरों ने सीमाओं पर दिखाया।
इस अवसर पर कारगिल युद्ध के रणबांकुरे सेवानिवृत्त कैप्टन गुरमेल सिंह, सूबेदार रविंद्र कौशिक और सूबेदार स्वर्ण सिंह ने जब युद्ध के अपने प्रेरक अनुभव साझा किए, तो वातावरण जोश, गर्व और भावुकता से भर गया। भारत माता की जय और वंदे मातरम् के घोष से विश्वविद्यालय का प्रांगण गूंज उठा। शौर्य गाथा के दौरान कई बार ऐसे पल भी आए, जब हर किसी की आंखें नम हो गई।
इस अवसर पर आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान ने कहा कि कारगिल विजय दिवस केवल एक तारीख नहीं, बल्कि यह भारत की अस्मिता, साहस और संकल्प का प्रतीक है। हमारे वीर सैनिकों ने जिस अदम्य साहस से मातृभूमि की रक्षा की, वह हर भारतीय के हृदय में अमिट है। जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। विश्वविद्यालय का यह दायित्व है कि हम युवा पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम, सेवा और समर्पण की भावना से भी ओतप्रोत करें। जब संकल्प मजबूत हो और लक्ष्य राष्ट्र हो, तो कोई ताकत हमें रोक नहीं सकती। कार्यक्रम में मंच संचालन डॉ. कृतिका,डॉ.डिंकी ने किया। कार्यक्रम के सफल आयोजन में प्रो. शीतल सिंगला और उप कुलसचिव विकास शर्मा की अहम भूमिका रही।
तन जाता है तो जाने दो, लेकिन झुकना नहीं:स्वर्ण सिंह
शौर्य की गाथा सुनाते हुए सेवानिवृत्त सूबेदार स्वर्ण सिंह ने कहा कि तन जाता है तो जाने दो, लेकिन झुकना नहीं चाहिए।
उन्होंने साल 1999 के कारगिल युद्ध में अपने दोनों पैर गंवा कर भी ड्यूटी निभाई और 2010 तक सेना में सेवा करते रहे। 19 मई 1999 की सुबह 11 बजे एक अफसर 14 जवान गश्त कर रहे थे कि जम्मू-कश्मीर में एक रूट पर तैनाती के दौरान रिमोट कंट्रोल से एक आईईडी ब्लास्ट किया गया। इस हमले में उनके कई साथी शहीद हो गए और स्वर्ण सिंह खुद बुरी तरह घायल हो गए। एक टांग मौके पर ही कट गई और दूसरी मांस के सहारे लटक गई। उन्हें श्रीनगर के सैन्य अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी दोनों टांगे काटनी पड़ीं। कारगिल युद्ध के 25 साल बाद भी वह उस मंजर को भूल नहीं पाते हैं। वे नौ महीने बिस्तर पर रहे,लेकिन फिर देश की सेवा के लिए खड़े हो गए। वे 2010 में वह सूबेदार के पद से सेवानिवृत्त हुए।
कहा था तिरंगा फहराकर लौटेंगे फिर उसी में लिपटकर:कौशिक
सूबेदार रविंद्र कौशिक ने कहा कि युद्ध के दौरान जब एक जवान ने पूछा-अब क्या होगा, तो जज्बे के साथ कहा था तिरंगा फहराकर लौटेंगे, या फिर उसी में लिपटकर आएंगे। साल 1999 की कारगिल जंग में जब पाकिस्तान की सेना ने मोर्चा खोला, तो नायब सूबेदार कौशिक ने दुर्गम पहाड़ों में जान की परवाह किए बिना अपने साथी सैनिकों को रसद पहुंचाई। उनके लिए देश पहले था और मौत बाद में। 102वीं इंफेंटरी बटालियन में तैनात नायब सूबेदार कौशिक की ड्यूटी पठानकोट से लड़ाई के मोर्चे तक रसद (गोला-बारूद) पहुंचाने की थी। कौशिक ने बताया कि रास्ता आसान नहीं था। कच्चे ट्रैक, लगातार गिरते ने पत्थर, खतरनाक खाई, ऊपर से दुश्मन की गोलियों की बारिश हो रही। फिर भी वे अपनी टुकड़ी के साथ लाहौल-स्पीति, लेह-लद्दाख और रोहतांग दर्रे को पार करते हुए चोटी पर जवानों तक पहुंचते रहे। भावुक होते हुए सूबेदार कौशिक ने बताया कि उनकी आंखों में न शहीद साथियों को भूलने की कोई जगह है, न देश के लिए जज्बा कम हुआ है। उन्होंने न केवल रसद पहुंचाई, बल्कि अपने साथी सैनिकों के पार्थिव शरीर को सम्मान के के साथ वापस भी लाए। जिले के शहीद स्मारक पर लिखे शहीद सैनिक साथियों के नाम पढ़कर हमेशा नमन करते हुए आंखे नम हो जाती हैं। उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि जब भी देश पर आफत आए तो बलिदान दे देना,लेकिन अपने भारत माता के साथ गद्दारी मत करना।
निजी स्वार्थ के उठकर देशहित में सोचना: कैप्टन गुरमेल सिंह
पूर्व कैप्टन गुरमेल सिंह ने शौर्य गाथा सुनाते हुए कहा कि उन्होंने 28 साल तक भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दी। 3 मई 1999 को कारगिल का युद्ध शुरू हुआ, जिसमें उन्हें कारगिल युद्ध में सेवा करने का मौका मिला। बताया कि कारगिल में इतना खतरा दुश्मनों से नहीं होता,जितना वहां के वातावरण से होता है। 18 हजार की ऊंचाई, -50 डिग्री सेल्सियस तक तापमान और ऑक्सीजन स्तर 3 से 4 परसेंट था। क्योंकि 2 मिनट में ही इंसान की मौत हो सकती थी। ये चुनौती भारतीय सेना के लिए भी थी,लेकिन भारतीय सेना ने संषर्घ किया दुश्मनों को वहां से खदेड़ा। उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर देश हित में सोचना। उन्होंने युवाओं को एनसीसी ज्वाइन करने तथा भारतीय सेना की ट्रेनिंग लेने की भी अपील की।
भारत माता के सपूतों एवं परिवारों को किया सम्मानित
कार्यक्रम में कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान, कुलसचिव प्रो. ब्रिजेंद्र सिंह तोमर, आरएंडआई के डायरेक्टर प्रो.देवेंद्र खुराना ने सेवानिवृत्त कैप्टन गुरमेल सिंह, सूबेदार रविंद्र कौशिक और सूबेदार स्वर्ण सिंह, वीर बलिदानी संजीव कुमार कौलापुर के परिजनों, वीर बलिदानी सुशील कुमार की धर्मपत्नी सुनीता देवी, वीर बलिदानी मंगत राम की धर्मपत्नी सुनीता देवी, बेटे गौरव सैनी, वीर बलिदानी मनदीप सिंह की माता निर्मला देवी व भाई संदीप सिंह को शॉल देकर सम्मानित किया,जिन्होंने अपने घर से एक दीपक भारत माता के चरणों में अर्पित किया। उनकी आंखों में गर्व था, और दिलों में वह दृढ़ता, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।
विश्वविद्यालय प्रांगण में रोपा गया शौर्य का पौधा
कारगिल विजय दिवस के अवसर पर वीरता और स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के प्रांगण में एक विशेष पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान, कुलसचिव प्रो. ब्रिजेंद्र सिंह तोमर, उपकुलसचिव विकास शर्मा, कारगिल युद्ध के योद्धा सेवानिवृत्त कैप्टन गुरमेल सिंह, सूबेदार रविंद्र कौशिक, सूबेदार स्वर्ण सिंह तथा वीर बलिदानियों के परिजनों ने वीरों के गांवों से लाई गई पवित्र मिट्टी से पौधरोपण किया। यह पौधा न केवल धरती को हरा करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को शौर्य, समर्पण और राष्ट्रप्रेम का संदेश भी देता रहेगा।
