नीलोखेड़ी /करनाल 18 जुलाई।   विस्तार शिक्षा संस्थान में प्राकृतिक खेती के विस्तार रणनीतियां विषय पर चल रहे पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुक्रवार को समापन हो गया। कार्यक्राम की अध्यक्षता संस्थान के क्षे़त्रीय निदेशक संजय कुमार ने की।
निदेशक संजय कुमार ने  प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि केमिकल फार्मिंग से जमीन की उर्वरा क्षमता कम होती है और यह स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक है। प्राकृतिक खेती इस समस्या के सर्वोत्तम समाधान के रूप में उभरी है। इसलिए हमें समय रहते इस पर विमर्श करना चाहिए। उन्होंने कहा कि विस्तार शिक्षा संस्थान नीलोखेड़ी चैधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के वाईस-चांसलर प्रोफेसर बी. आर. कंबोज के मार्गदर्शन में उत्तर भारत के कृषि वैज्ञानिकों एवं विस्तार अधिकारियों को प्रशिक्षण देने का काम कर रहा है।
प्रशिक्षण कार्यक्रम के संयोजक डॉ. भरत सिंह घनघस ने कहा कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड एवं जम्मू-कश्मीर के विस्तार अधिकारियों ने हिस्सा लिया है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती से मृदा में सुधार होने के साथ-साथ, उत्पादों को बाजार में अधिक दाम मिलता है, इसके अतिरिक्त यह कृषि पद्धति पर्यावरण हितैषी भी है, एवं इसमें खेती के लिए खाद-दवाई पर निर्भरता नहीं रहती इसलिए यह हमारे स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है।
उन्होंने प्राकृतिक खेती के मुख्य लाभ जैसे कृषि लागत कम कर किसान को कर्ज मुक्त बनाने में अहम योगदान है क्योंकि इसमें किसी भी बाहरी आदान का प्रयोग नहीं किया जाता है। आज के समय में रसायन युक्त खेती से किसानों को मुक्त करवाने के लिए प्राकृतिक खेती सबसे अच्छा उपाय है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती के चार स्तंभ जीवामृत, बीजामृत, वाफसा एवं मल्चिंग हैं। प्राकृतिक खेती में सूक्ष्म जीवों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और ये हर जगह पाए जाते हैं। केमिकल फार्मिंग में कीटनाशकों इत्यादि के छिड़काव से ये सूक्ष्म जीव मर जाते हैं,जबकि ये सूक्ष्म जीव बहुत ही लाभदायक होते है। प्राकृतिक खेती में इन सूक्ष्म जीवो के माध्यम से पौधे को नाइट्रोजन, फासफोरस एवं जिंक इत्यादि पोषक तत्व मिलते हैं। इनसे मृदा की उर्वरा क्षमता भी बढती है इसके अतिरिक्त ये कृषि अवशेषों को गलाने में भी मदद करते हैं।
उन्होंने बताया कि  फसल चक्र, मिश्रित फसल एवं इंटर क्रोपिंग इत्यादि विधियां भी प्राकृतिक खेती में महत्वपूर्ण होती हैं। कृषि लागत कम करने, किसानों की आमदनी बढ़ाने में भी प्राकृतिक खेती कारगर है। प्राकृतिक खेती में जो कुछ भी लगता है वह किसान के घर में ही मौजूद है। गाय, गोबर, गौमूत्र, पेड़, की मिट्टी, नीम की पत्तियां, गुड़ व बेसन ये सब किसान के घर में ही रहता है। इन्हीं से जीवामृत व बीजामृत तैयार होगा व प्राकृतिक खेती को बढ़ाया जा सकता है। प्राकृतिक खेती को छोटे खेत में शुरू करने के पश्चात जब अनुभव हो जाए तो धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए एवं पूर्णतः प्राकृतिक खेती को अपनाना चाहिए। प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान प्रशिक्षुओं को प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण संस्थान, गुरूकुल कुरूक्षेत्र एवं करोड़ा गांव के प्राकृतिक खेती किसान मनोज के फार्म का भ्रमण भी करवाया गया। इस अवसर पर डां. सत्यकाम मलिक, डा. जसविंद्र कौर, एवं डॉ. अजय कुमार सहित सभी प्रतिभागी मौजूद रहें।

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